BASO-302 SOLVED PAPER JUNE 2025, 4th Semester, भारतीय सामाजिक समस्या
प्रश्न 01.सामाजिक समस्या का क्या अर्थ है? सामाजिक समस्याओं की अध्ययन पद्धतियों की विस्तार से व्याख्या कीजिए।
(क) सामाजिक समस्या का अर्थ
सामाजिक समस्या वह स्थिति या व्यवहार है जो समाज के एक बड़े वर्ग को प्रभावित करता है, सामाजिक मूल्यों व मान्यताओं के विरुद्ध होता है तथा जिसके कारण समाज के सामान्य जीवन में बाधा उत्पन्न होती है। ऐसी समस्याएँ केवल व्यक्तिगत नहीं होतीं, बल्कि सामूहिक होती हैं और इनके समाधान के लिए सामाजिक प्रयास आवश्यक होते हैं।
परिभाषाएँ
- माजूमदार के अनुसार – “सामाजिक समस्या वह स्थिति है जो समाज के एक महत्वपूर्ण वर्ग को अवांछनीय प्रतीत होती है और जिसके समाधान के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है।”
- हॉर्टन एवं लेस्ली के अनुसार – “सामाजिक समस्या वह दशा है जो समाज के अनेक व्यक्तियों को प्रभावित करती है और जिसे समाज के लोग बदलना चाहते हैं।”
उदाहरण: गरीबी, बेरोजगारी, अपराध, नशाखोरी, दहेज प्रथा, बाल श्रम, जातिवाद, भ्रष्टाचार आदि।
(ख) सामाजिक समस्याओं की अध्ययन पद्धतियाँ
सामाजिक समस्याओं को समझने और उनके कारण व प्रभाव जानने के लिए विभिन्न अध्ययन पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है। प्रमुख पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं—
1. ऐतिहासिक पद्धति
इस पद्धति में सामाजिक समस्या के विकास को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है। यह देखा जाता है कि समस्या कब, कैसे और किन परिस्थितियों में उत्पन्न हुई तथा समय के साथ उसमें क्या परिवर्तन आए।
उदाहरण: दहेज प्रथा का ऐतिहासिक विकास।
2. सांख्यिकीय पद्धति
इस पद्धति में आंकड़ों (Statistics) के माध्यम से सामाजिक समस्याओं का अध्ययन किया जाता है। जनगणना रिपोर्ट, सर्वेक्षण, तालिकाएँ, प्रतिशत आदि का प्रयोग होता है।
लाभ: अध्ययन वस्तुनिष्ठ व तुलनात्मक बनता है।
उदाहरण: बेरोजगारी दर, अपराध के आंकड़े।
3. सर्वेक्षण पद्धति
इसमें प्रश्नावली (Questionnaire) या साक्षात्कार (Interview) के माध्यम से प्रत्यक्ष रूप से लोगों से जानकारी एकत्र की जाती है।
उपयोगिता: वर्तमान सामाजिक स्थिति को समझने में सहायक।
उदाहरण: किसी क्षेत्र में नशाखोरी की स्थिति का अध्ययन।
4. केस स्टडी (व्यक्तिगत अध्ययन) पद्धति
इस पद्धति में किसी एक व्यक्ति, परिवार या समुदाय का गहन अध्ययन किया जाता है।
लाभ: समस्या की गहराई तक जानकारी मिलती है।
उदाहरण: किसी अपराधी के जीवन का अध्ययन।
5. तुलनात्मक पद्धति
इस पद्धति में दो या अधिक समाजों, समुदायों या समय-कालों की तुलना करके सामाजिक समस्या का अध्ययन किया जाता है।
उदाहरण: ग्रामीण व शहरी गरीबी की तुलना।
6. समाजशास्त्रीय निरीक्षण पद्धति
इसमें शोधकर्ता स्वयं सामाजिक स्थिति का प्रत्यक्ष अवलोकन करता है और तथ्यों को संकलित करता है।
उदाहरण: झुग्गी-झोपड़ी क्षेत्रों में जीवन-स्थितियों का निरीक्षण।
निष्कर्ष
सामाजिक समस्याएँ समाज के विकास में बाधक होती हैं। इनके वैज्ञानिक अध्ययन के लिए विभिन्न पद्धतियाँ अपनाई जाती हैं, जिनसे समस्या के कारण, स्वरूप और समाधान को समझने में सहायता मिलती है। प्रभावी समाधान के लिए इन पद्धतियों का समन्वित प्रयोग आवश्यक है।
प्रश्न 02.साम्प्रदायिकता के अर्थ एवं अवधारणा को समझाते हुए इसके प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए।
(क) साम्प्रदायिकता का अर्थ
साम्प्रदायिकता वह सामाजिक प्रवृत्ति है जिसमें व्यक्ति या समूह अपने धार्मिक समुदाय के हितों को सर्वोपरि मानते हुए अन्य धर्मों या समुदायों के प्रति असहिष्णुता, वैमनस्य या विरोध की भावना रखता है। इसमें धर्म को सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक स्वार्थों की पूर्ति का साधन बना लिया जाता है।
परिभाषा
- बी.आर. अम्बेडकर के अनुसार – “जब किसी धार्मिक समूह के हितों को सम्पूर्ण समाज के हितों से ऊपर रखा जाता है, तो वह साम्प्रदायिकता कहलाती है।”
- अशोक मेहता के अनुसार – “धर्म के आधार पर सामाजिक विभाजन और संघर्ष की प्रवृत्ति साम्प्रदायिकता है।”
(ख) साम्प्रदायिकता की अवधारणा
साम्प्रदायिकता की अवधारणा धर्म से जुड़ी हुई है, परंतु यह केवल धार्मिक भावना नहीं है। यह एक सामाजिक-राजनीतिक विचारधारा है जिसमें—
- धर्म की संकीर्ण व्याख्या की जाती है।
- अपने समुदाय को श्रेष्ठ और अन्य को निम्न समझा जाता है।
- सामाजिक एकता की जगह विभाजन को बढ़ावा मिलता है।
- राजनीति, शिक्षा और मीडिया में धार्मिक पहचान का दुरुपयोग होता है।
इस प्रकार साम्प्रदायिकता राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव के लिए घातक मानी जाती है।
(ग) साम्प्रदायिकता के प्रमुख कारण
1. ऐतिहासिक कारण
भारत में ब्रिटिश शासन की “फूट डालो और राज करो” नीति ने साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया। इतिहास की पक्षपाती व्याख्या ने भी धार्मिक कटुता को जन्म दिया।
2. राजनीतिक कारण
राजनीतिक दलों द्वारा धर्म का राजनीतिकरण किया जाता है। चुनावों में वोट बैंक की राजनीति के लिए धार्मिक भावनाओं को भड़काया जाता है।
3. सामाजिक-आर्थिक असमानता
गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा के कारण लोग आसानी से साम्प्रदायिक विचारधाराओं का शिकार बन जाते हैं।
4. अशिक्षा और अज्ञानता
शिक्षा की कमी से लोगों में तर्कशीलता का अभाव रहता है, जिससे वे अफवाहों और कट्टर विचारों पर विश्वास कर लेते हैं।
5. धार्मिक कट्टरता
कुछ धार्मिक नेताओं द्वारा धर्म की गलत व्याख्या कर लोगों में असहिष्णुता और घृणा फैलाना साम्प्रदायिकता को बढ़ाता है।
6. मीडिया और सोशल मीडिया का दुरुपयोग
भड़काऊ भाषण, झूठी खबरें और अफवाहें साम्प्रदायिक तनाव को तेजी से फैलाती हैं।
7. सांस्कृतिक अलगाव
विभिन्न समुदायों के बीच संवाद और मेल-जोल की कमी भी साम्प्रदायिकता को जन्म देती है।
निष्कर्ष
साम्प्रदायिकता समाज की एक गंभीर समस्या है, जो सामाजिक एकता और राष्ट्रीय अखंडता को कमजोर करती है। इसके उन्मूलन के लिए शिक्षा, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक संवाद और जिम्मेदार राजनीति अत्यंत आवश्यक है।
प्रश्न 03.क्षेत्रवाद के क्या उद्देश्य हैं? भारत में क्षेत्रवाद के निवारण हेतु उपायों की व्याख्या कीजिए।
(क) क्षेत्रवाद के उद्देश्य
क्षेत्रवाद वह प्रवृत्ति है जिसमें किसी विशेष क्षेत्र के लोग अपने क्षेत्रीय हितों को राष्ट्रीय हितों से ऊपर मानने लगते हैं। इसके पीछे कुछ प्रमुख उद्देश्य होते हैं—
-
क्षेत्रीय हितों की रक्षा
अपने क्षेत्र के लोगों के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हितों की सुरक्षा करना। -
आर्थिक विकास की माँग
पिछड़े क्षेत्रों के विकास, अधिक संसाधन, उद्योग, रोजगार और बुनियादी सुविधाएँ प्राप्त करना। -
राजनीतिक शक्ति प्राप्त करना
क्षेत्रीय दलों द्वारा सत्ता में भागीदारी या अलग राज्य/स्वायत्तता की माँग। -
सांस्कृतिक और भाषाई पहचान की रक्षा
अपनी भाषा, परंपराओं और संस्कृति को सुरक्षित रखना। -
प्रशासनिक सुविधा
छोटे राज्यों या क्षेत्रीय स्वशासन के माध्यम से बेहतर प्रशासन की माँग।
(ख) भारत में क्षेत्रवाद के निवारण हेतु उपाय
-
संतुलित क्षेत्रीय विकास
पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत ढाँचे का विकास कर क्षेत्रीय असमानता को कम करना। -
राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास
शिक्षा और मीडिया के माध्यम से राष्ट्रीयता, सहिष्णुता और “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना को मजबूत करना। -
भाषाई और सांस्कृतिक सम्मान
सभी भाषाओं और संस्कृतियों को समान सम्मान देकर अलगाव की भावना को समाप्त करना। -
राजनीतिक सुधार
क्षेत्रीय भावनाओं के राजनीतिक दुरुपयोग पर नियंत्रण, जिम्मेदार राजनीति और चुनावी सुधार लागू करना। -
प्रभावी संघीय व्यवस्था
केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग, संसाधनों का न्यायसंगत वितरण और राज्यों को पर्याप्त स्वायत्तता देना। -
शिक्षा का प्रसार
वैज्ञानिक, तर्कसंगत और मूल्य-आधारित शिक्षा से संकीर्ण क्षेत्रीय सोच को कम करना। -
संचार और परिवहन का विकास
बेहतर सड़क, रेल, डिजिटल कनेक्टिविटी से क्षेत्रों के बीच संपर्क बढ़ाना।
निष्कर्ष
क्षेत्रवाद तब तक सकारात्मक हो सकता है जब तक वह विकास और प्रशासनिक सुधार तक सीमित रहे। किंतु जब यह राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध जाता है, तब घातक बन जाता है। संतुलित विकास, शिक्षा और समन्वित राजनीति द्वारा भारत में क्षेत्रवाद का प्रभावी निवारण संभव है।
प्रश्न 04. भ्रष्टाचार क्या है? भारतीय समाज से इसका उन्मूलन कैसे किया जा सकता है?
उत्तर :
(क) भ्रष्टाचार का अर्थ
भ्रष्टाचार वह सामाजिक बुराई है जिसमें व्यक्ति अपने पद, शक्ति या अधिकार का दुरुपयोग निजी लाभ के लिए करता है। इसमें रिश्वत लेना-देना, पक्षपात, भाई-भतीजावाद, घूसखोरी, सरकारी धन का दुरुपयोग आदि शामिल हैं। भ्रष्टाचार समाज में नैतिक मूल्यों के पतन को दर्शाता है और सामाजिक न्याय व विकास में बाधा बनता है।
परिभाषा
- लॉर्ड एक्टन के अनुसार — “सत्ता भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूर्णतः भ्रष्ट करती है।”
- संयुक्त राष्ट्र के अनुसार — “सार्वजनिक शक्ति का निजी लाभ हेतु दुरुपयोग भ्रष्टाचार कहलाता है।”
(ख) भारतीय समाज से भ्रष्टाचार के उन्मूलन के उपाय
1. नैतिक एवं मूल्य आधारित शिक्षा
विद्यालय और परिवार स्तर पर ईमानदारी, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व की शिक्षा देना आवश्यक है।
2. कड़े कानून और उनका प्रभावी क्रियान्वयन
भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों को सख्ती से लागू करना तथा दोषियों को शीघ्र और कठोर दंड देना चाहिए।
3. प्रशासनिक पारदर्शिता
सरकारी कार्यों में पारदर्शिता, ई-गवर्नेंस, ऑनलाइन सेवाएँ और डिजिटल भुगतान से भ्रष्टाचार कम किया जा सकता है।
4. स्वतंत्र और सशक्त संस्थाएँ
लोकपाल, लोकायुक्त, सीबीआई जैसी संस्थाओं को राजनीतिक दबाव से मुक्त और मजबूत बनाना चाहिए।
5. राजनीतिक सुधार
राजनीति में स्वच्छ छवि वाले लोगों को बढ़ावा देना, चुनावी खर्च पर नियंत्रण और राजनीतिक दलों की वित्तीय पारदर्शिता आवश्यक है।
6. मीडिया और सामाजिक जागरूकता
मीडिया, सोशल मीडिया और नागरिक समाज द्वारा भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करना और जनता को जागरूक बनाना चाहिए।
7. जनभागीदारी और सामाजिक आंदोलन
लोगों की सक्रिय भागीदारी, शिकायत निवारण तंत्र और जन आंदोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रभावी हथियार हैं।
निष्कर्ष
भ्रष्टाचार भारतीय समाज की एक गंभीर समस्या है, जो विकास और लोकतंत्र को कमजोर करती है। इसके उन्मूलन के लिए शिक्षा, कानून, पारदर्शिता, नैतिकता और जनसहभागिता का समन्वित प्रयास आवश्यक है।
प्रश्न 04. गरीबी से आप क्या समझते हैं? गरीबी के प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
(क) गरीबी का अर्थ
गरीबी वह सामाजिक-आर्थिक अवस्था है जिसमें व्यक्ति अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं—जैसे भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य—को भी पूरा करने में असमर्थ रहता है। जब किसी व्यक्ति की आय या संसाधन जीवन के न्यूनतम स्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं होते, तो उसे गरीबी की स्थिति कहा जाता है।
परिभाषा
- सेबोहम राउंट्री के अनुसार — “गरीबी वह अवस्था है जिसमें आय इतनी कम होती है कि जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति संभव नहीं हो पाती।”
- विश्व बैंक के अनुसार — “जब व्यक्ति की आय जीवन के न्यूनतम मानकों से नीचे होती है, तो वह गरीबी कहलाती है।”
(ख) गरीबी के प्रमुख कारण
1. जनसंख्या वृद्धि
तेजी से बढ़ती जनसंख्या के कारण संसाधनों पर दबाव बढ़ता है और रोजगार के अवसर कम पड़ जाते हैं, जिससे गरीबी बढ़ती है।
2. बेरोजगारी और अल्परोजगार
पर्याप्त रोजगार के अवसर न होने से लोगों की आय कम रहती है और वे गरीबी में जीवन यापन करने को विवश होते हैं।
3. अशिक्षा
शिक्षा के अभाव में व्यक्ति कुशल रोजगार प्राप्त नहीं कर पाता, जिससे उसकी आय सीमित रह जाती है।
4. आर्थिक असमानता
समाज में धन और संसाधनों का असमान वितरण गरीबी को बढ़ावा देता है।
5. कृषि पर निर्भरता
भारत में बड़ी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, जहाँ आय अनिश्चित और कम होती है।
6. सामाजिक कारण
जातिवाद, भेदभाव, बाल विवाह और दहेज जैसी कुप्रथाएँ भी गरीबी को बढ़ाती हैं।
7. प्राकृतिक आपदाएँ
बाढ़, सूखा, भूकंप जैसी आपदाएँ लोगों की आजीविका को नष्ट कर देती हैं, जिससे गरीबी बढ़ती है।
निष्कर्ष
गरीबी एक गंभीर सामाजिक समस्या है, जो व्यक्ति और समाज दोनों के विकास में बाधक है। इसके उन्मूलन के लिए शिक्षा, रोजगार सृजन, जनसंख्या नियंत्रण और संतुलित आर्थिक विकास आवश्यक है।
प्रश्न 05. भ्रष्टाचार क्या है? भारतीय समाज से इसका उन्मूलन कैसे किया जा सकता है?
उत्तर :
(क) भ्रष्टाचार का अर्थ
भ्रष्टाचार वह सामाजिक बुराई है जिसमें व्यक्ति अपने पद, शक्ति या अधिकार का दुरुपयोग निजी लाभ के लिए करता है। इसमें रिश्वत लेना-देना, पक्षपात, भाई-भतीजावाद, घूसखोरी, सरकारी धन का दुरुपयोग आदि शामिल हैं। भ्रष्टाचार समाज में नैतिक मूल्यों के पतन को दर्शाता है और सामाजिक न्याय व विकास में बाधा बनता है।
परिभाषा
- लॉर्ड एक्टन के अनुसार — “सत्ता भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूर्णतः भ्रष्ट करती है।”
- संयुक्त राष्ट्र के अनुसार — “सार्वजनिक शक्ति का निजी लाभ हेतु दुरुपयोग भ्रष्टाचार कहलाता है।”
(ख) भारतीय समाज से भ्रष्टाचार के उन्मूलन के उपाय
1. नैतिक एवं मूल्य आधारित शिक्षा
विद्यालय और परिवार स्तर पर ईमानदारी, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व की शिक्षा देना आवश्यक है।
2. कड़े कानून और उनका प्रभावी क्रियान्वयन
भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों को सख्ती से लागू करना तथा दोषियों को शीघ्र और कठोर दंड देना चाहिए।
3. प्रशासनिक पारदर्शिता
सरकारी कार्यों में पारदर्शिता, ई-गवर्नेंस, ऑनलाइन सेवाएँ और डिजिटल भुगतान से भ्रष्टाचार कम किया जा सकता है।
4. स्वतंत्र और सशक्त संस्थाएँ
लोकपाल, लोकायुक्त, सीबीआई जैसी संस्थाओं को राजनीतिक दबाव से मुक्त और मजबूत बनाना चाहिए।
5. राजनीतिक सुधार
राजनीति में स्वच्छ छवि वाले लोगों को बढ़ावा देना, चुनावी खर्च पर नियंत्रण और राजनीतिक दलों की वित्तीय पारदर्शिता आवश्यक है।
6. मीडिया और सामाजिक जागरूकता
मीडिया, सोशल मीडिया और नागरिक समाज द्वारा भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करना और जनता को जागरूक बनाना चाहिए।
7. जनभागीदारी और सामाजिक आंदोलन
लोगों की सक्रिय भागीदारी, शिकायत निवारण तंत्र और जन आंदोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रभावी हथियार हैं।
निष्कर्ष
भ्रष्टाचार भारतीय समाज की एक गंभीर समस्या है, जो विकास और लोकतंत्र को कमजोर करती है। इसके उन्मूलन के लिए शिक्षा, कानून, पारदर्शिता, नैतिकता और जनसहभागिता का समन्वित प्रयास आवश्यक है।
(लघु उत्तरों वाले प्रश्न)
प्रश्न 01. मद्यपान से आप क्या समझते हैं? व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
मद्यपान का अर्थ
मद्यपान से आशय शराब अथवा मादक पेय पदार्थों के सेवन से है, जिनमें अल्कोहल की मात्रा होती है और जो व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक जीवन को प्रभावित करते हैं। जब कोई व्यक्ति नियमित या अत्यधिक मात्रा में शराब का सेवन करता है और वह उसकी आदत या लत बन जाती है, तो उसे मद्यपान की समस्या कहा जाता है।
मद्यपान की व्याख्या
मद्यपान केवल एक व्यक्तिगत आदत नहीं बल्कि एक सामाजिक समस्या है। इसके प्रभाव निम्न रूपों में दिखाई देते हैं—
-
शारीरिक प्रभाव
अत्यधिक मद्यपान से यकृत (लीवर) खराब होना, हृदय रोग, पाचन संबंधी समस्याएँ और रोग-प्रतिरोधक क्षमता में कमी आती है। -
मानसिक प्रभाव
मद्यपान से निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होती है, चिड़चिड़ापन, अवसाद और मानसिक असंतुलन बढ़ता है। -
पारिवारिक प्रभाव
घरेलू हिंसा, पारिवारिक कलह, बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव और आर्थिक संकट उत्पन्न होता है। -
सामाजिक प्रभाव
अपराध, सड़क दुर्घटनाएँ, कार्यक्षमता में कमी और सामाजिक प्रतिष्ठा का ह्रास होता है। -
आर्थिक प्रभाव
आय का बड़ा भाग शराब पर खर्च हो जाता है, जिससे गरीबी और ऋण की स्थिति बनती है।
निष्कर्ष
मद्यपान एक गंभीर सामाजिक बुराई है, जो व्यक्ति के स्वास्थ्य, परिवार और समाज तीनों के लिए हानिकारक है। इसके नियंत्रण के लिए सामाजिक जागरूकता, नैतिक शिक्षा और प्रभावी कानूनों की आवश्यकता है।
प्रश्न 02. भारत में बेरोजगारी समाप्त करने के उपाय बताइये।
उत्तर :
भारत में बेरोजगारी एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्या है, जो गरीबी, अपराध और असमानता को बढ़ाती है। इसे समाप्त या कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं—
1. औद्योगीकरण का विस्तार
नए उद्योगों की स्थापना, विशेषकर लघु एवं कुटीर उद्योगों के विकास से रोजगार के अधिक अवसर उत्पन्न किए जा सकते हैं।
2. शिक्षा और कौशल विकास
व्यावसायिक शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, आईटीआई, स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रमों से युवाओं को रोजगार-योग्य बनाया जा सकता है।
3. कृषि क्षेत्र का विकास
आधुनिक कृषि तकनीक, सिंचाई सुविधाएँ, कृषि आधारित उद्योगों और फूड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देकर ग्रामीण रोजगार बढ़ाया जा सकता है।
4. स्वरोजगार को प्रोत्साहन
स्टार्ट-अप इंडिया, मुद्रा योजना, स्वयं सहायता समूहों और सूक्ष्म वित्त के माध्यम से लोगों को अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित करना।
5. जनसंख्या नियंत्रण
जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण से रोजगार और संसाधनों पर दबाव कम होगा।
6. सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार
सरकारी योजनाओं, आधारभूत ढाँचा परियोजनाओं और मनरेगा जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से रोजगार उपलब्ध कराना।
7. श्रम-प्रधान क्षेत्रों को बढ़ावा
निर्माण, वस्त्र, पर्यटन और सेवा क्षेत्रों में निवेश बढ़ाकर अधिक रोजगार सृजित किए जा सकते हैं।
8. ग्रामीण विकास
ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और डिजिटल कनेक्टिविटी का विकास कर पलायन कम किया जा सकता है।
निष्कर्ष
भारत में बेरोजगारी की समस्या का समाधान तभी संभव है जब शिक्षा, उद्योग, कृषि और जनसंख्या नीति में संतुलित और समन्वित सुधार किए जाएँ।
प्रश्न 03. भ्रष्टाचार के क्षेत्र की संक्षिप्त में व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
भ्रष्टाचार समाज के अनेक क्षेत्रों में फैला हुआ है। इसके प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं—
1. प्रशासनिक क्षेत्र
सरकारी कार्यालयों में रिश्वत, फाइलों को आगे बढ़ाने के लिए अवैध धन की माँग, पद का दुरुपयोग आदि प्रशासनिक भ्रष्टाचार के उदाहरण हैं।
2. राजनीतिक क्षेत्र
चुनाव में धनबल का प्रयोग, वोट खरीदना, सत्ता प्राप्ति हेतु गलत साधनों का उपयोग और राजनीतिक संरक्षण भ्रष्टाचार को बढ़ाता है।
3. न्यायिक क्षेत्र
न्याय दिलाने में देरी, पक्षपात या फैसलों को प्रभावित करने के प्रयास न्यायिक भ्रष्टाचार के अंतर्गत आते हैं।
4. आर्थिक एवं व्यावसायिक क्षेत्र
कर चोरी, घोटाले, जमाखोरी, कालाबाज़ारी और अनुचित लाभ कमाना आर्थिक भ्रष्टाचार के रूप हैं।
5. शिक्षा क्षेत्र
प्रवेश, परीक्षा, नियुक्ति और मान्यता में अनियमितताएँ शिक्षा क्षेत्र में भ्रष्टाचार को दर्शाती हैं।
6. स्वास्थ्य क्षेत्र
अवैध कमीशन, नकली दवाइयाँ, भर्ती और उपचार में लापरवाही स्वास्थ्य क्षेत्र के भ्रष्टाचार के उदाहरण हैं।
निष्कर्ष
भ्रष्टाचार समाज के लगभग सभी क्षेत्रों में व्याप्त है, जिससे सामाजिक विश्वास और विकास बाधित होता है। इसके नियंत्रण हेतु पारदर्शिता और नैतिकता आवश्यक है।
प्रश्न 04. सामाजिक विचलन की विशेषताएँ बताइये।
उत्तर :
सामाजिक विचलन (Social Deviance) से आशय ऐसे व्यवहार से है जो समाज द्वारा स्वीकृत नियमों, मान्यताओं और मूल्यों के विरुद्ध होता है। सामाजिक विचलन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
1. सामाजिक नियमों का उल्लंघन
सामाजिक विचलन में व्यक्ति समाज के स्थापित नियमों और आचार-संहिताओं का पालन नहीं करता।
2. समाज द्वारा अस्वीकृति
विचलित व्यवहार को समाज अनुचित या अवांछनीय मानता है और इसकी निंदा करता है।
3. समय और समाज के अनुसार परिवर्तनशील
जो व्यवहार एक समाज या समय में विचलन माना जाता है, वही दूसरे समाज या समय में सामान्य हो सकता है।
4. सापेक्ष प्रकृति
सामाजिक विचलन पूर्ण नहीं बल्कि सापेक्ष होता है; यह सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
5. दंड या सामाजिक नियंत्रण का विषय
विचलित व्यवहार करने वाले व्यक्ति को सामाजिक या कानूनी दंड का सामना करना पड़ सकता है।
6. व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों कारण
सामाजिक विचलन के पीछे व्यक्तिगत (मनोवैज्ञानिक) और सामाजिक कारण दोनों होते हैं।
7. सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित करता है
अत्यधिक सामाजिक विचलन समाज में अव्यवस्था, अपराध और तनाव उत्पन्न कर सकता है।
निष्कर्ष
सामाजिक विचलन समाज के नियमों से हटकर किया गया व्यवहार है, जिसकी प्रकृति सापेक्ष और परिवर्तनशील होती है।
प्रश्न 05. श्वेतवसन अपराध के लक्षणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
श्वेतवसन अपराध (White Collar Crime) से आशय ऐसे अपराधों से है जो समाज के उच्च वर्ग, प्रतिष्ठित एवं शिक्षित व्यक्तियों द्वारा अपने पेशे या पद का दुरुपयोग करके किए जाते हैं। इन अपराधों के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं—
1. प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा किया जाना
श्वेतवसन अपराध सामान्यतः समाज के सम्मानित, शिक्षित और उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा किए जाते हैं।
2. पेशे या पद का दुरुपयोग
ये अपराध व्यक्ति के व्यवसाय, पद या अधिकार से जुड़े होते हैं, जैसे—सरकारी अधिकारी, व्यापारी, डॉक्टर, वकील आदि।
3. अहिंसक प्रकृति
श्वेतवसन अपराध प्रायः बिना शारीरिक हिंसा के किए जाते हैं, जैसे—घोटाले, कर चोरी, रिश्वतखोरी।
4. आर्थिक लाभ की प्रधानता
इन अपराधों का मुख्य उद्देश्य अवैध आर्थिक लाभ प्राप्त करना होता है।
5. गुप्त रूप से किया जाना
ये अपराध योजनाबद्ध और छिपे हुए तरीके से किए जाते हैं, जिससे इन्हें पकड़ना कठिन होता है।
6. कानूनी दंड से बचने की संभावना
अपराधी अपने प्रभाव, धन और कानूनी ज्ञान के कारण दंड से बचने में सफल हो जाते हैं।
7. समाज को व्यापक क्षति
इन अपराधों से समाज और अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होता है, जबकि प्रत्यक्ष पीड़ित कम दिखाई देते हैं।
निष्कर्ष
श्वेतवसन अपराध समाज के लिए अत्यंत घातक होते हैं क्योंकि ये विश्वास, नैतिकता और आर्थिक व्यवस्था को कमजोर करते हैं।
प्रश्न 06. प्रदूषण नियंत्रण हेतु उपाय लिखिए।
उत्तर :
प्रदूषण आज की प्रमुख सामाजिक-पर्यावरणीय समस्या है, जो मानव स्वास्थ्य और प्राकृतिक संतुलन दोनों को प्रभावित करती है। प्रदूषण नियंत्रण हेतु निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं—
1. औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण
कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट और धुएँ का वैज्ञानिक उपचार कर ही उसे वातावरण में छोड़ा जाए। प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों का अनिवार्य प्रयोग किया जाए।
2. स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा का प्रयोग
कोयला और पेट्रोलियम के स्थान पर सौर, पवन, जल एवं जैव-ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दिया जाए।
3. वृक्षारोपण और वन संरक्षण
अधिक से अधिक पेड़ लगाए जाएँ तथा वनों की कटाई पर रोक लगाई जाए, जिससे वायु शुद्ध बनी रहे।
4. वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर रोक
सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहन, इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग तथा नियमित प्रदूषण जाँच आवश्यक है।
5. कचरा प्रबंधन
ठोस, तरल और प्लास्टिक कचरे का पृथक्करण, पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) और वैज्ञानिक निपटान किया जाए।
6. जल प्रदूषण की रोकथाम
नदियों और जल स्रोतों में गंदा पानी, रसायन और कचरा डालने पर प्रतिबंध लगाया जाए तथा सीवेज उपचार संयंत्रों की स्थापना की जाए।
7. जनजागरूकता और शिक्षा
पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाना और पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देना आवश्यक है।
8. कठोर कानून और उनका पालन
पर्यावरण संरक्षण कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए और उल्लंघन करने वालों को दंड दिया जाए।
निष्कर्ष
प्रदूषण नियंत्रण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। सामूहिक प्रयास से ही स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण संभव है।
प्रश्न 07. भिक्षावृत्ति के कारणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
भिक्षावृत्ति वह सामाजिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति आजीविका के साधन न होने के कारण दूसरों से भिक्षा माँगकर जीवन यापन करता है। यह एक गंभीर सामाजिक समस्या है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—
1. गरीबी
अत्यधिक गरीबी के कारण व्यक्ति की मूल आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पातीं, जिससे वह भिक्षावृत्ति अपनाने को विवश हो जाता है।
2. बेरोजगारी
रोजगार के अवसर न होने पर व्यक्ति आय अर्जित नहीं कर पाता और भिक्षा पर निर्भर हो जाता है।
3. अशिक्षा
शिक्षा के अभाव में व्यक्ति को उपयुक्त कार्य नहीं मिल पाता, जिससे वह भिक्षावृत्ति की ओर बढ़ता है।
4. शारीरिक अक्षमता और बीमारी
विकलांगता, वृद्धावस्था या गंभीर बीमारी के कारण व्यक्ति श्रम करने में असमर्थ हो जाता है।
5. पारिवारिक विघटन
परिवार का टूटना, कलह, परित्याग या माता-पिता की मृत्यु भी व्यक्ति को भिक्षावृत्ति की ओर धकेल देती है।
6. सामाजिक कुप्रथाएँ
जातिगत भेदभाव, बाल विवाह, दहेज और सामाजिक उपेक्षा जैसे कारण भी भिक्षावृत्ति को बढ़ाते हैं।
7. प्राकृतिक आपदाएँ
बाढ़, सूखा, भूकंप जैसी आपदाओं से आजीविका नष्ट होने पर लोग भिक्षावृत्ति अपनाते हैं।
8. धार्मिक परंपराएँ और मानसिकता
कुछ स्थानों पर धार्मिक भावनाओं के कारण भिक्षा को प्रोत्साहन मिलता है, जिससे यह प्रवृत्ति बनी रहती है।
निष्कर्ष
भिक्षावृत्ति सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक कारणों का परिणाम है। इसके उन्मूलन के लिए रोजगार, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और जनजागरूकता आवश्यक है।
प्रश्न 08. आत्महत्या के कारणों को समझाइये।
उत्तर :
आत्महत्या वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति मानसिक, सामाजिक या आर्थिक दबावों के कारण स्वयं अपना जीवन समाप्त करने का प्रयास करता है। यह एक गंभीर सामाजिक एवं मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। आत्महत्या के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—
1. मानसिक तनाव और अवसाद
लगातार चिंता, निराशा, अकेलापन और अवसाद व्यक्ति को आत्महत्या की ओर प्रेरित कर सकता है।
2. पारिवारिक समस्याएँ
घरेलू कलह, तलाक, पारिवारिक उपेक्षा, माता-पिता या जीवनसाथी से तनाव आत्महत्या का कारण बन सकता है।
3. आर्थिक समस्याएँ
गरीबी, बेरोजगारी, कर्ज, व्यापार में घाटा आदि से व्यक्ति अत्यधिक दबाव में आ जाता है।
4. परीक्षा और करियर का दबाव
छात्रों में परीक्षा में असफलता, प्रतिस्पर्धा और भविष्य की चिंता आत्महत्या के मामलों को बढ़ाती है।
5. सामाजिक अपमान और असफलता
समाज में अपमान, बदनामी, प्रेम में असफलता या सामाजिक बहिष्कार व्यक्ति को तोड़ देता है।
6. नशाखोरी और मद्यपान
नशे की आदत निर्णय क्षमता को कमजोर कर देती है, जिससे आत्महत्या का खतरा बढ़ जाता है।
7. बीमारी और शारीरिक पीड़ा
लंबी बीमारी, असाध्य रोग और शारीरिक पीड़ा व्यक्ति को जीवन से निराश कर देती है।
8. सामाजिक अलगाव
समर्थन की कमी, अकेलापन और सामाजिक संपर्क का अभाव आत्महत्या के जोखिम को बढ़ाता है।
निष्कर्ष
आत्महत्या के कारण बहुआयामी होते हैं। इसके रोकथाम के लिए मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ, पारिवारिक सहयोग, सामाजिक समर्थन और जागरूकता अत्यंत आवश्यक है।

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