UOU VAC-15 SOLVED PAPER DECEMBER 2024
आज हम आपको UOU STUDY POINT की तरफ से UTTRAKHAND OPEN UNIVERSITY के पेपर Code VAC-15 के 1st and 2nd Semester के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर लाए है जो आपकी परीक्षा में बहुत उपयोगी होंगे
प्रश्न 01: प्राचीन भारतीय मंदिर निर्माण शैलियों का सोदाहरण वर्णन कीजिए।
भारत में मंदिर निर्माण की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। वेदकालीन यज्ञ–वेदियों से विकसित होकर गुप्तकाल, चालुक्य, पल्लव, चोल, पांड्य, राष्ट्रकूट और अन्य राजवंशों के संरक्षण में मंदिर स्थापत्य ने विशिष्ट शैलियाँ ग्रहण कीं। मुख्यतः भारतीय मंदिर वास्तुकला तीन प्रमुख शैलियों में विभाजित की जाती है –
1. नागर शैली (उत्तरी भारत की शैली)
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प्रमुख क्षेत्र – उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, ओडिशा)।
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विशेषताएँ –
- शिखर ऊँचे व गोलाकार (Rekha-Prasada) होते हैं।
- गर्भगृह (गर्भगृह) के ऊपर सीधी रेखाओं वाला ऊँचा शिखर।
- मंडप (सभा स्थान) एवं प्रांगण।
- दीवारों पर सुन्दर मूर्तिकला व अलंकरण।
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उदाहरण –
- कंदरिया महादेव मंदिर (खजुराहो, मध्यप्रदेश)
- लिंगराज मंदिर (भुवनेश्वर, ओडिशा)
- सूर्य मंदिर (कोणार्क, ओडिशा)
2. द्रविड़ शैली (दक्षिण भारत की शैली)
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प्रमुख क्षेत्र – तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक।
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विशेषताएँ –
- मंदिर ऊँचे गोपुरम (प्रवेश द्वार) के लिए प्रसिद्ध।
- गर्भगृह के ऊपर पिरामिडाकार शिखर (विमान)।
- विस्तृत प्रांगण, स्तंभित मंडप, जलकुण्ड।
- पत्थर पर सूक्ष्म नक्काशी और विशाल मूर्तियाँ।
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उदाहरण –
- बृहदेश्वर मंदिर (तंजावुर, चोल वंश)
- मीनाक्षी मंदिर (मदुरै)
- शोर मंदिर (मामल्लपुरम, पल्लव कालीन)
3. वेसर शैली (मिश्रित शैली)
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प्रमुख क्षेत्र – दक्कन (कर्नाटक, आंध्र, महाराष्ट्र)।
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विशेषताएँ –
- यह नागर और द्रविड़ शैलियों का मिश्रण है।
- गर्भगृह पर कभी नागर शैली का शिखर, तो कभी द्रविड़ शैली का विमान।
- बहुभुजाकार मंडप, अलंकरण और शिल्पकला दोनों का संगम।
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उदाहरण –
- होयसलेश्वर मंदिर (हलेबीडु, कर्नाटक)
- बेलूर का चन्नकेशव मंदिर
- पट्टदकल के मंदिर (युनेस्को विश्व धरोहर स्थल)
निष्कर्ष
भारतीय मंदिर स्थापत्य केवल पूजा स्थल न होकर कला, वास्तुकला और धार्मिक आस्था का अद्भुत संगम है। नागर शैली उत्तर भारत की पहचान है, द्रविड़ शैली दक्षिण भारत की भव्यता को दर्शाती है, जबकि वेसर शैली इन दोनों का संतुलित रूप है।
प्रश्न 02 : भारतीय अर्थव्यवस्था की नवीनतम विशेषताओं का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर :
भारतीय अर्थव्यवस्था वर्तमान समय (2025-26) में विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनी हुई है। इसकी नवीनतम विशेषताएँ निम्न प्रकार से हैं—
1. आर्थिक वृद्धि
- भारत की GDP वृद्धि दर लगभग 6.3–6.8% अनुमानित है, जो चीन सहित अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक है।
- आर्थिक वृद्धि में सबसे बड़ा योगदान घरेलू उपभोग, सेवा क्षेत्र और अवसंरचना निवेश का रहा है।
2. मुद्रास्फीति (Inflation)
- खुदरा मुद्रास्फीति घटकर 2–3% तक आ गई है, जो कई वर्षों का सबसे निचला स्तर है।
- RBI का लक्ष्य 4% के आसपास मुद्रास्फीति रखना है, और वर्तमान स्थिति लक्ष्य से भी बेहतर है।
3. मौद्रिक नीति और वित्तीय स्थिति
- RBI ने 2025 में ब्याज दरों (policy rate) में कटौती कर 6.0% तक ला दिया है।
- केंद्र सरकार का वित्तीय घाटा FY25 में 4.8% था, जिसे FY26 में घटाकर 4.4% करने का लक्ष्य रखा गया है।
- विदेशी मुद्रा भंडार लगभग $640 अरब तक पहुंच गया है।
4. रोजगार और श्रम बाजार
- बेरोजगारी दर औसतन 5–5.2% रही है, जो पहले की तुलना में कम है।
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों दोनों में रोजगार के अवसरों में सुधार हुआ है, किंतु गुणवत्तापूर्ण नौकरियों की चुनौती बनी हुई है।
5. कृषि और औद्योगिक क्षेत्र
- खाद्यान्न उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा है, जो पिछले 5 वर्षों के औसत से भी अधिक है।
- निर्माण और सेवा क्षेत्र (विशेषकर IT, वित्तीय सेवाएँ और स्टार्टअप्स) तेजी से बढ़ रहे हैं।
6. व्यापार और निवेश
- सेवा क्षेत्र का निर्यात 12% से अधिक बढ़ा है।
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में भी 18% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।
- हालाँकि, अमेरिका द्वारा लगाए गए उच्च टैरिफ (50%) भारतीय निर्यात पर दबाव डाल सकते हैं।
7. तकनीकी विकास
- भारत का AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) उद्योग 2025 तक $8 अरब तक पहुँचने की संभावना है।
- डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया जैसी नीतियाँ तकनीकी विकास को बढ़ावा दे रही हैं।
8. बाहरी जोखिम और चुनौतियाँ
- वैश्विक व्यापार तनाव, अमेरिका के टैरिफ और कच्चे तेल की कीमतें भारत के लिए चुनौती बनी हुई हैं।
- खाद्य मुद्रास्फीति मौसम और आपूर्ति बाधाओं पर निर्भर रहती है।
निष्कर्ष
भारतीय अर्थव्यवस्था वर्तमान में तेज़ी से बढ़ने वाली, स्थिर और लचीली है। कम मुद्रास्फीति, मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, घरेलू मांग, कृषि व सेवाओं की प्रगति तथा तकनीकी नवाचार इसकी प्रमुख ताकतें हैं। हालांकि, वैश्विक टैरिफ, रोजगार की गुणवत्ता और खाद्य मुद्रास्फीति जैसी चुनौतियाँ भविष्य में सतत विकास के लिए नीति-निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी।
प्रश्न 03 : 1919 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के प्रावधानों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए
भारत शासन अधिनियम 1919 (Government of India Act, 1919) को मोंटेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधार (Montagu–Chelmsford Reforms) भी कहा जाता है। यह अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा भारत सरकार में राजनीतिक सुधार लागू करने हेतु पारित किया गया था।
1. प्रमुख प्रावधान
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द्वैध शासन (Dyarchy) की स्थापना –
- प्रांतों में शासन को दो भागों में बाँटा गया :
- आरक्षित विषय (जैसे – पुलिस, न्याय, भूमि राजस्व, सिंचाई) गवर्नर और उनके अधिकारियों के अधीन।
- हस्तांतरित विषय (जैसे – शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, स्थानीय स्वशासन) मंत्रियों के अधीन।
- मंत्रियों को प्रांतीय विधानमंडल में चुने गए भारतीय सदस्यों से नियुक्त किया गया।
- प्रांतों में शासन को दो भागों में बाँटा गया :
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केंद्रीय स्तर पर सुधार –
- केंद्र में द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना (काउंसिल ऑफ स्टेट और लेजिस्लेटिव असेंबली)।
- गवर्नर जनरल को वेटो शक्ति और आपातकालीन अध्यादेश जारी करने का अधिकार मिला।
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मताधिकार का विस्तार –
- कुछ संपत्ति, कर, शिक्षा और सामाजिक हैसियत वाले वर्ग को मताधिकार दिया गया।
- हालांकि मतदाता संख्या कुल जनसंख्या का केवल लगभग 10% थी।
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भारत सचिव और गवर्नर जनरल की शक्तियाँ –
- वास्तविक सत्ता गवर्नर जनरल और ब्रिटिश संसद के हाथों में रही।
- भारतीय मंत्रियों की भूमिका सीमित रही।
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केंद्रीय व प्रांतीय सूची –
- विषयों को केंद्र और प्रांतों में बाँटा गया।
- परंतु सर्वोच्च अधिकार केंद्र सरकार (गवर्नर जनरल) के पास रहा।
2. सकारात्मक पहलू
- भारतीयों को पहली बार प्रांतीय स्तर पर प्रशासन में भागीदारी का अवसर मिला।
- प्रांतों में शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे क्षेत्रों में भारतीय मंत्रियों की जिम्मेदारी तय हुई।
- केंद्रीय स्तर पर द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना भारतीय राजनीति में एक नया चरण था।
- 1917 के मोंटेग्यू घोषणा ("भारत में उत्तरदायी सरकार धीरे–धीरे स्थापित की जाएगी") को कानूनी रूप मिला।
3. नकारात्मक पहलू (आलोचनात्मक मूल्यांकन)
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द्वैध शासन की असफलता –
- "आरक्षित" और "हस्तांतरित" विषयों के विभाजन ने प्रशासन को जटिल बना दिया।
- गवर्नर के पास मंत्रियों के निर्णय को पलटने का अधिकार था, जिससे मंत्रियों की जिम्मेदारी केवल नाममात्र रह गई।
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केंद्रीय नियंत्रण अधिक –
- वास्तविक शक्तियाँ अब भी ब्रिटिश अधिकारियों और गवर्नर जनरल के पास केंद्रित थीं।
- विधानमंडल के निर्णय गवर्नर जनरल की अनुमति के बिना प्रभावी नहीं हो सकते थे।
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मताधिकार का सीमित दायरा –
- जनसंख्या के विशाल हिस्से को मतदान से वंचित रखा गया।
- केवल शिक्षित, संपन्न और उच्चवर्गीय भारतीयों को भागीदारी दी गई।
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जन अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं –
- कांग्रेस और अन्य राष्ट्रीय नेताओं की माँग थी कि "उत्तरदायी सरकार" दी जाए।
- परंतु यह अधिनियम केवल "नाम मात्र की सहभागिता" पर आधारित रहा।
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ब्रिटिश हित सर्वोपरि –
- सभी महत्वपूर्ण विभाग (राजस्व, पुलिस, रक्षा) गवर्नर के नियंत्रण में रखे गए।
- भारतीय मंत्रियों को असली प्रशासनिक अधिकार नहीं मिले।
4. परिणाम और प्रभाव
- इस अधिनियम ने भारतीयों को यह अनुभव कराया कि ब्रिटिश सुधार अधूरे और भ्रामक हैं।
- कांग्रेस ने इसे अस्वीकार किया और 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ।
- यह अधिनियम भारतीय राजनीति में स्वराज की माँग को और प्रबल बनाने वाला साबित हुआ।
✦ निष्कर्ष
1919 का गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट भारतीय स्वशासन की दिशा में एक कदम अवश्य था, परंतु यह भारतीय जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने में पूर्णतः असफल रहा। यह सुधार ब्रिटिश साम्राज्य की औपनिवेशिक नियंत्रण नीति का ही अंग था। परिणामस्वरूप, यह अधिनियम भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए और अधिक तेजी और व्यापकता का कारण बना।
प्रश्न 04 : भारतीय संविधान की विशेषताओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए
भारत का संविधान विश्व का सबसे विस्तृत और लिखित संविधान है। यह 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और आज भी भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है। इसके निर्माण में भारतीय परंपरा, स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों तथा विदेशी संविधानों से लिए गए तत्वों का सुंदर समन्वय है।
1. भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
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लिखित और विस्तृत संविधान –
- इसमें लगभग 395 अनुच्छेद (प्रारंभ में), 22 भाग और 8 अनुसूचियाँ थीं (वर्तमान में अनुच्छेद व अनुसूचियों की संख्या अधिक है)।
- इसमें शासन प्रणाली के सभी पहलुओं का विस्तार से उल्लेख है।
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संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य –
- संविधान भारत को पूर्णतः संप्रभु (सर्वोच्च), लोकतांत्रिक (जनसत्ता आधारित) और गणराज्य (जन-निर्वाचित राष्ट्रपति) घोषित करता है।
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संघीय प्रणाली में एकात्मक झुकाव –
- केंद्र और राज्यों में शक्तियों का विभाजन है, परंतु आपातकाल की स्थिति में यह एकात्मक स्वरूप ले लेता है।
- भारत का संघीय ढाँचा "लचीला" और "केंद्राभिमुख" है।
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मौलिक अधिकार और कर्तव्य –
- संविधान नागरिकों को 6 प्रकार के मौलिक अधिकार देता है।
- 42वें संशोधन (1976) से मौलिक कर्तव्य भी जोड़े गए।
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नीतिनिर्देशक तत्व (Directive Principles of State Policy) –
- ये समाजवादी और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को दर्शाते हैं।
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स्वतंत्र न्यायपालिका और न्यायिक पुनरीक्षण (Judicial Review) –
- सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय संविधान की सर्वोच्चता की रक्षा करते हैं।
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धर्मनिरपेक्षता –
- सभी धर्मों को समान स्थान प्राप्त है।
- राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है।
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संशोधन की प्रक्रिया –
- संविधान न तो अत्यधिक कठोर है और न ही अत्यधिक लचीला।
- संसद द्वारा विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं से संशोधन किया जा सकता है।
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संसदीय शासन प्रणाली –
- ब्रिटिश संसदीय प्रणाली पर आधारित, जहाँ वास्तविक शक्ति मंत्रिपरिषद और प्रधानमंत्री के पास है।
2. संविधान की आलोचनात्मक समीक्षा
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अत्यधिक लंबा और जटिल –
- यह विश्व का सबसे बड़ा संविधान है, जिसके कारण आम नागरिक के लिए इसे समझना कठिन है।
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संघीयता पर प्रश्न –
- आपातकालीन प्रावधानों और केंद्र के अधिक अधिकारों के कारण इसे "क्वासी–फेडरल" कहा जाता है।
- राज्यों को स्वायत्तता सीमित है।
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अधिकार और कर्तव्य का असंतुलन –
- प्रारंभ में केवल अधिकार दिए गए, कर्तव्यों का समावेश बाद में हुआ।
- आज भी नागरिकों में कर्तव्यों के प्रति जागरूकता कम है।
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न्यायपालिका की अति–सक्रियता –
- न्यायिक पुनरीक्षण की शक्ति ने न्यायपालिका को अत्यधिक प्रभावशाली बना दिया है, जिससे कभी-कभी "न्यायिक सक्रियता" और "न्यायिक हस्तक्षेप" की आलोचना होती है।
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निर्देशक सिद्धांतों की बाध्यता का अभाव –
- नीति-निर्देशक तत्व केवल मार्गदर्शन देते हैं, इन्हें न्यायालय में लागू नहीं कराया जा सकता।
- सामाजिक–आर्थिक समानता लाने में बाधाएँ आईं।
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दलों की भूमिका और राजनीतिक अस्थिरता –
- संविधान में दलगत राजनीति की समस्याओं का समाधान पर्याप्त रूप से नहीं किया गया।
- दल-बदल, भ्रष्टाचार और गठबंधन राजनीति इसके आदर्शों को कमजोर करते हैं।
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संशोधन की लचीलापन और दुरुपयोग –
- संविधान में अनेक संशोधन (100 से अधिक) हो चुके हैं।
- कभी-कभी संशोधनों का प्रयोग सत्तारूढ़ दल ने अपने हित साधन हेतु किया है।
3. निष्कर्ष
भारतीय संविधान लोकतंत्र, समानता, न्याय और स्वतंत्रता की जीवंत गारंटी है। यह विविधताओं से भरे भारत को एक सूत्र में बाँधता है। हालांकि इसमें कुछ व्यावहारिक कठिनाइयाँ और आलोचनाएँ अवश्य हैं—जैसे संघीय ढाँचे की कमजोरी, अत्यधिक विस्तार, और राजनीतिक दुरुपयोग—फिर भी यह संविधान भारतीय लोकतंत्र को स्थिरता और दिशा देने में सफल रहा है।
प्रश्न 05 : आर्थिक नियोजन से आप क्या समझते हैं? भारत जैसे अल्पविकसित राष्ट्र के लिए आर्थिक नियोजन के औचित्य एवं उसकी सफलता की शर्तों पर विस्तृत चर्चा
1) आर्थिक नियोजन की संकल्पना (Concept)
आर्थिक नियोजन का अर्थ है—निर्धारित अवधि के भीतर पूर्व-निर्धारित सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों (जैसे वृद्धि, रोज़गार, गरीबी-उन्मूलन, क्षेत्रीय संतुलन, मानव-विकास) को प्राप्त करने हेतु संसाधनों का सचेत, संगठित और प्राथमिकताबद्ध आवंटन।
- प्रकार:
- आदेशात्मक (Command/Directive) योजना—राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण में लक्ष्य व आवंटन।
- संकेतात्मक (Indicative) योजना—बाज़ार-प्रेरित अर्थव्यवस्था में सरकार दिशानिर्देश, प्रोत्साहन, अवसंरचना व नीति-ढाँचा देती है।
- उपकरण: सार्वजनिक निवेश, कर-नीति, ऋण व ब्याज नीति, उद्योग/व्यापार नीति, सब्सिडी व ट्रांसफर, विनियमन, भूमि-पानी-ऊर्जा जैसी आधारभूत सुविधाएँ।
2) भारत-जैसे अल्पविकसित/विकासशील राष्ट्रों में आर्थिक नियोजन का औचित्य
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समन्वय विफलता व अपूर्ण बाज़ार
– शुरुआती चरण में निजी क्षेत्र बड़े-बड़े अविभाज्य निवेश (बिजली, स्टील, परिवहन) नहीं उठा पाता। योजना “बिग-पुश” देकर पूरक क्षेत्रों में एकसाथ निवेश का समन्वय कराती है। -
पूँजी व बचत का अभाव
– घरेलू बचत कम, वित्तीय बाज़ार उथले। योजना कर-संरचना, लघु बचत व संस्थागत वित्त से पूँजी निर्माण बढ़ाती और उसे प्राथमिक क्षेत्रों में ले जाती है। -
संरचनात्मक परिवर्तन की आवश्यकता
– कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था को उद्योग, सेवाएँ और आधुनिक कृषि की ओर स्थानांतरित करने हेतु क्षेत्रवार लक्ष्य, प्रोत्साहन व तकनीकी प्रसार जरूरी—जो योजना द्वारा संभव है। -
रोज़गार सृजन व गरीबी-उन्मूलन
– केवल GDP वृद्धि काफी नहीं; समावेशी विकास हेतु श्रम-प्रधान क्षेत्रों, ग्रामीण गैर-कृषि गतिविधियों, कौशल-विकास व सामाजिक सुरक्षा का लक्षित विस्तार योजना के माध्यम से किया जाता है। -
क्षेत्रीय असमानता का निवारण
– पिछड़े क्षेत्रों में अवसंरचना, उद्योग-स्थापन, कर-रियायतें, विशेष पैकेज—योजना क्षेत्रीय संतुलन का साधन है। -
मानव-विकास व सार्वजनिक वस्तुएँ
– स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, जल-स्वच्छता, पर्यावरण—ये सार्वजनिक वस्तुएँ हैं; निजी क्षेत्र स्वाभाविक रूप से कम निवेश करता है। योजना इनके लिए संसाधन सुनिश्चित करती है। -
स्थिरता और बाह्य संतुलन
– मूल्य-स्थिरता, भुगतान संतुलन, कृषि-उद्योग जोड़, खाद्य-सुरक्षा आदि उद्देश्यों में मैक़्रो-समन्वय योजना से आता है। -
तकनीकी पकड़ व नवाचार
– अनुसंधान, स्टार्ट-अप, स्थानीयकरण (indigenization) और प्रौद्योगिकी-हस्तांतरण के लिए नीति-समर्थन व सार्वजनिक निवेश योजना के माध्यम से लक्षित किया जाता है।
3) भारत का संदर्भ: संक्षिप्त परिदृश्य
- 1951 से पंचवर्षीय योजनाओं ने भारी उद्योग, बाँध, इस्पात, उर्वरक, परिवहन व हरित क्रांति जैसी पहलों से उत्पादन-आधार खड़ा किया; साथ ही लाइसेंस-परमिट-नियंत्रण से अक्षमताएँ भी उपजीं।
- 1991 के बाद उदारीकरण के साथ योजना का स्वरूप आदेशात्मक से संकेतात्मक हुआ। 2015 में नीति आयोग (NITI Aayog) के जरिए सहकारी संघवाद, दीर्घकालिक दृष्टि-दस्तावेज, परिणाम-आधारित निगरानी व पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप पर बल बढ़ा—यानी “योजना” अब दिशा-निर्देश, अवसंरचना-प्रेरक और सुधार-एजेंडा का रूप अधिक है।
4) आर्थिक नियोजन की सफलता की शर्तें (Conditions for Success)
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स्पष्ट, यथार्थ और प्राथमिकताबद्ध लक्ष्य
– सीमित संसाधनों में कुछ चुने हुए ‘लीवर’ (जैसे ऊर्जा, परिवहन, सिंचाई, स्वास्थ्य-शिक्षा, कौशल) पर केंद्रित, मात्रात्मक लक्ष्यों (आउटकम/KPI) के साथ। -
विश्वसनीय आँकड़े व धारणाएँ
– अद्यतन डेटा, इनपुट-आउटपुट/मैक्रो मॉडल, मांग-आपूर्ति आकलन, स्थानीय-स्तर की भागीदारी; साक्ष्य-आधारित नीति। -
संसाधन संचयन व वित्तीय अनुशासन
– कर-सुधार, व्यय-तर्कसंगतीकरण, “कैपेक्स बनाम रेवेन्यू” का संतुलन, ऋण-स्थिरता, PPP व FDI का विवेकपूर्ण उपयोग; सब्सिडी का लक्ष्यीकरण/DBT। -
कार्यान्वयन क्षमता (State Capacity)
– परियोजना-तैयारी (DPR), समय-लागत प्रबंधन, सार्वजनिक खरीद की पारदर्शिता, ठेका-प्रदाय में दक्षता, वन-स्टॉप क्लीयरेंस, विवाद-निपटान की गति। -
नीति-पर्यावरण: बाज़ार संकेत + सामाजिक लक्ष्य
– प्रतिस्पर्धा, नियमन की गुणवत्ता, संपत्ति-अधिकार, लॉजिस्टिक्स सुधार, श्रम/भूमि सुधार के साथ समावेशन (MSME-समर्थन, महिला-उद्यमिता, उद्यम-सरलीकरण)। -
संघवाद व विकेन्द्रीकरण
– राज्यों/जिलों/शहरी-स्थानीय निकायों तक योजना-तैयारी व बजट का अधिकार; प्रदर्शन-आधारित अनुदान; इंटर-स्टेट सीख-विनिमय। -
मानव-पूँजी व कौशल
– स्वास्थ्य-पोषण, बुनियादी साक्षरता-संख्याज्ञान, उद्योग-सापेक्ष कौशल, डिजिटल साक्षरता; स्कूल-टू-वर्क सुचारु संक्रमण। -
निरंतर निगरानी, सामाजिक लेखा-जोखा व फीडबैक
– रीयल-टाइम डैशबोर्ड, तीसरे-पक्ष मूल्यांकन, सामुदायिक सहभागिता, मिड-कोर्स करेक्शन के लिए लचीलापन। -
राजनीतिक इच्छाशक्ति व नीतिगत स्थिरता
– बहु-वर्षीय परियोजनाओं को परिवर्तन-रोधी (policy insulation), समय पर धन-रिलीज़, पारदर्शी संचार। -
पर्यावरण-सस्टेनेबिलिटी
– जल, भूमि, वायु-गुणवत्ता; नवीकरणीय ऊर्जा, परिपत्र अर्थव्यवस्था; जलवायु-जोखिम अनुकूलन—ग्रीन प्लानिंग।
5) आलोचनात्मक दृष्टि: नियोजन की सीमाएँ भी समझें
- अतिनियमन/लाइसेंस-राज से नवाचार व प्रतिस्पर्धा घट सकती है।
- कमजोर डेटा/क्षमता से लक्ष्य–क्रियान्वयन अंतर बढ़ता है।
- राजनीतिक चक्र, “व्हाइट एलीफ़ैंट” परियोजनाएँ, लागत-वृद्धि व रीइंतेंशनल अलोकेशन (rent seeking) का जोखिम।
- यदि बाज़ार-संकेतों की अनदेखी हो तो गलत क्षेत्रीय/क्षेत्रीय आवंटन और दाम-विकृति बनती है।
6) निष्कर्ष
अल्पविकसित/विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक नियोजन का औचित्य सुदृढ़ है, क्योंकि यह बाज़ार-विफलताओं, संसाधन-कमी और संरचनात्मक अवरोधों के बीच समन्वित, समावेशी और दीर्घकालीन परिवर्तन का मार्ग बनाता है। भारत के अनुभव से सीख यह है कि योजना और बाज़ार परस्पर विरोधी नहीं; आधारभूत ढाँचा, मानव-विकास, हरित परिवर्तन और क्षेत्रीय संतुलन में राज्य-नेतृत्व आवश्यक है, जबकि प्रतिस्पर्धी-बाज़ार व उद्यमिता दक्षता व नवाचार सुनिश्चित करते हैं। इसलिए आज के भारत में संकेतात्मक, साक्ष्य-आधारित, सहकारी-संघवाद वाली नियोजन-दृष्टि—सुदृढ़ कार्यान्वयन व जवाबदेही के साथ—सफलता की कुंजी है।
Short Answer Type Questions
प्रश्न 01 : गांधार कला शैली
1. प्रस्तावना
भारतीय कला इतिहास में गांधार कला शैली (Gandhara School of Art) का विशेष स्थान है। यह शैली लगभग पहली शताब्दी ई.पू. से पाँचवीं शताब्दी ई. तक प्रचलित रही। इसका विकास मुख्यतः गांधार क्षेत्र (वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान – पेशावर, रावलपिंडी, तक्षशिला, जलालाबाद आदि) में हुआ। यह शैली भारतीय और यूनानी कला के संमिश्रण (Indo-Greek / Greco-Buddhist art) का उत्कृष्ट उदाहरण है।
2. उद्भव और संरक्षण
- गांधार कला का उद्भव कुषाण शासक कनिष्क के संरक्षण में हुआ।
- इस पर यूनानी, रोमन और पार्थियन कला का गहरा प्रभाव था।
- यह मुख्यतः बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार से जुड़ी हुई थी।
3. प्रमुख विशेषताएँ
-
संमिश्रण कला (Hybrid Character)
- यूनानी–रोमन मूर्तिकला की वास्तविकता (Realism) और भारतीय धार्मिक विषयों का संगम।
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बुद्ध की मूर्तियाँ
- बुद्ध की प्रथम मूर्तियाँ यहीं निर्मित हुईं।
- बुद्ध को मानवीय रूप (Human form) में प्रस्तुत करने की शुरुआत इसी शैली से हुई।
- मूर्तियों में ग्रीक देवता अपोलो की झलक दिखाई देती है।
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मूर्तियों की विशेषताएँ
- सीधी नाक, बड़ी गहरी आँखें, तराशे हुए होंठ।
- घुँघराले बाल और रोमन शैली का चोगा (ड्रेपरी)।
- शरीर पर वस्त्र की महीन सिलवटें स्पष्ट दिखाई देती हैं।
- चेहरों पर गंभीरता और आध्यात्मिकता।
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विषयवस्तु
- बुद्ध की जीवन-घटनाएँ : जन्म, दीक्षा, धर्मचक्र प्रवर्तन, महापरिनिर्वाण।
- बोधिसत्व, देवदूत, यक्ष–यक्षिणी और गंधर्व चित्रण।
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सामग्री
- प्रमुखत: स्लेट, बलुआ पत्थर और स्टुको (Plaster) का प्रयोग।
4. प्रमुख केंद्र
- तक्षशिला
- मथुरा (कुछ हद तक प्रभावित)
- जलालाबाद (अफगानिस्तान)
- पेशावर घाटी
5. योगदान
- बुद्ध के जीवन को जनसाधारण के लिए दृश्यरूप में प्रस्तुत किया।
- भारतीय कला में मानवीकरण (Anthropomorphic form) की परंपरा की शुरुआत।
- बाद की शैलियों (अजन्ता, एलोरा, मथुरा) पर गहरा प्रभाव।
6. आलोचनात्मक मूल्यांकन
- गांधार कला भारतीयता से अधिक यूनानी प्रभाव वाली मानी जाती है।
- इसमें भारतीय भावनात्मक गहराई कम और बाह्य सौंदर्य अधिक है।
- फिर भी, यह भारत की सांस्कृतिक समन्वय शक्ति और धार्मिक सहिष्णुता का अद्वितीय उदाहरण है।
✦ निष्कर्ष
गांधार कला शैली ने भारतीय कला को नया आयाम दिया। यह केवल मूर्तिकला नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति और सभ्यता के वैश्विक आदान-प्रदान का प्रतीक है। इसने बुद्ध के मानवीय स्वरूप को संसार के समक्ष प्रस्तुत कर बौद्ध धर्म के प्रसार में ऐतिहासिक योगदान दिया।
प्रश्न 02 : भारतीय संस्कृति में उपस्थित प्रमुख भाषागत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए
1. प्रस्तावना
भारत विश्व का एक प्राचीनतम सांस्कृतिक देश है, जिसकी विविधता में एकता सबसे बड़ी पहचान है। इस विविधता का सबसे बड़ा आयाम भाषाएँ हैं। भारतीय संस्कृति में भाषाओं की बहुलता और उनकी विशेषताएँ न केवल सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती हैं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक धरोहर और सामाजिक ताने-बाने की झलक भी देती हैं।
2. भारतीय भाषाओं का उद्भव और वर्गीकरण
-
भारतीय भाषाओं का विकास मुख्य रूप से चार भाषा परिवारों से हुआ है –
- इंडो-आर्यन (Indo-Aryan) – संस्कृत, हिन्दी, बंगला, मराठी, गुजराती आदि।
- द्रविड़ (Dravidian) – तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम।
- ऑस्ट्रिक/मुंडा (Austric/Munda) – संथाली, मुंडारी, हो आदि।
- तिब्बती-बर्मी (Tibeto-Burman) – बोडो, नागा, मणिपुरी आदि।
-
संस्कृत को ‘देवभाषा’ माना जाता है, जो भारतीय संस्कृति की आधारशिला है।
3. प्रमुख भाषागत विशेषताएँ
(क) प्राचीनता और निरंतरता
- भारत की भाषाओं की जड़ें वैदिक संस्कृत से जुड़ी हैं।
- आज भी वैदिक मंत्र और ग्रंथ भारतीय संस्कृति में जीवंत हैं।
(ख) भाषाई विविधता
- भारत में 22 अनुसूचित भाषाएँ और 1000 से अधिक बोलियाँ प्रचलित हैं।
- हर क्षेत्र की अपनी विशेष भाषाई पहचान है।
(ग) लिपियों की विविधता
- ब्राह्मी, खरोष्ठी से लेकर देवनागरी, तमिल, बंगाली, गुजराती आदि लिपियाँ विकसित हुईं।
- लिपियों ने भारतीय साहित्य, शिलालेख और संस्कृति को समृद्ध किया।
(घ) संस्कृत का प्रभाव
- संस्कृत ने भारतीय संस्कृति को धार्मिक, दार्शनिक और साहित्यिक आधार दिया।
- अधिकांश भारतीय भाषाओं की शब्दावली पर संस्कृत का प्रभाव है।
(ङ) बहुभाषिकता (Multilingualism)
- भारतवासी अक्सर अनेक भाषाएँ बोलते हैं।
- यह सांस्कृतिक संपर्क और आदान-प्रदान का प्रतीक है।
(च) क्षेत्रीयता और लोकभाषाएँ
- लोकभाषाओं और बोलियों ने लोककथाओं, गीतों, लोकनाट्य आदि को जन्म दिया।
- इससे भारतीय संस्कृति की जड़ों को मजबूती मिली।
(छ) भाषाओं का सांस्कृतिक योगदान
- बौद्ध और जैन धर्म के प्रचार हेतु पाली और प्राकृत का प्रयोग।
- भक्ति आंदोलन ने हिंदी, अवधी, ब्रज, तमिल, तेलुगु आदि क्षेत्रीय भाषाओं को समृद्ध किया।
- आधुनिक काल में भाषाओं ने राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
4. आलोचनात्मक दृष्टि
- भाषाई विविधता कभी-कभी क्षेत्रीयता और अलगाववाद को जन्म देती है।
- फिर भी, भारतीय संविधान ने सभी भाषाओं को सम्मान देकर एकता बनाए रखी है।
5. निष्कर्ष
भारतीय संस्कृति में भाषाएँ केवल संचार का माध्यम नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान, आध्यात्मिक अभिव्यक्ति और सामाजिक एकता का आधार हैं। संस्कृत से लेकर आधुनिक भाषाओं तक का विकास यह दर्शाता है कि भारतीय संस्कृति गतिशील, बहुभाषी और बहुरंगी होते हुए भी एक साझा सांस्कृतिक धारा से जुड़ी हुई है।
प्रश्न 03 : प्राचीन भारतीय समाज में जातिप्रथा के स्वरूप पर चर्चा कीजिए
1. प्रस्तावना
भारतीय समाज की सबसे विशिष्ट सामाजिक संस्था जाति व्यवस्था रही है। यह व्यवस्था मूलतः वर्ण-प्रथा के रूप में आरंभ हुई, जो आगे चलकर जातिप्रथा के रूप में विकसित हुई। जातिप्रथा ने प्राचीन भारतीय समाज को संगठित करने के साथ-साथ उसकी संरचना और जीवन पद्धति को भी गहराई से प्रभावित किया।
2. जातिप्रथा की उत्पत्ति
-
ऋग्वेद में वर्ण-व्यवस्था का उल्लेख मिलता है, जिसमें समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया –
- ब्राह्मण – ज्ञान, शिक्षा और यज्ञकर्म।
- क्षत्रिय – शासन और रक्षा।
- वैश्य – कृषि, पशुपालन और व्यापार।
- शूद्र – सेवा और श्रम।
-
प्रारंभिक अवस्था में यह व्यवस्था गुण-कर्म पर आधारित थी, जन्म पर नहीं।
-
कालांतर में यह व्यवस्था वंशानुगत और कठोर हो गई, जिसे हम जातिप्रथा कहते हैं।
3. जातिप्रथा का स्वरूप
(क) जन्म आधारित व्यवस्था
- जाति व्यक्ति के जन्म से निर्धारित होने लगी।
- सामाजिक गतिशीलता (mobility) समाप्त हो गई।
(ख) सामाजिक संगठन
- प्रत्येक जाति की अपनी संस्कृति, नियम और रीति-रिवाज थे।
- अंतर्जातीय विवाह वर्जित था।
(ग) श्रम विभाजन
- समाज में कार्यों का बंटवारा जातियों के आधार पर हुआ।
- इससे उत्पादन और व्यवसायिक स्थिरता बनी रही।
(घ) सामाजिक असमानता
- उच्च और निम्न जातियों का भेद स्पष्ट हुआ।
- शूद्रों और अस्पृश्यों को सामाजिक अन्याय सहना पड़ा।
(ङ) धर्म और शास्त्रों का समर्थन
- मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों ने जातिप्रथा को धर्मसम्मत घोषित किया।
- यज्ञ, पूजा और धार्मिक कर्मकांड ब्राह्मणों के अधिकार क्षेत्र में रहे।
(च) आर्थिक एवं राजनीतिक भूमिका
- शासक वर्ग (क्षत्रिय) शासन चलाते थे, किंतु धार्मिक वैधता ब्राह्मणों से प्राप्त होती थी।
- वैश्य समाज की आर्थिक रीढ़ बने।
4. जातिप्रथा के प्रभाव
(सकारात्मक)
- समाज में संगठन और श्रम विभाजन सुनिश्चित हुआ।
- परंपराओं और संस्कारों की निरंतरता बनी रही।
- विभिन्न जातियों ने अपने-अपने क्षेत्र में विशेष दक्षता प्राप्त की।
(नकारात्मक)
- सामाजिक असमानता और भेदभाव बढ़ा।
- अस्पृश्यता जैसी कुरीति ने भारतीय समाज को कमजोर किया।
- जातिगत भेदभाव ने राष्ट्रीय एकता और सामाजिक गतिशीलता में बाधा डाली।
5. निष्कर्ष
प्राचीन भारतीय समाज में जातिप्रथा का स्वरूप पहले लचीला और गुण-कर्म आधारित था, किंतु समय के साथ यह जन्म आधारित और कठोर बन गई। इसने जहाँ एक ओर समाज को संगठित और स्थिर किया, वहीं दूसरी ओर असमानता और विभाजन को भी जन्म दिया। आधुनिक काल में सामाजिक सुधार आंदोलनों और भारतीय संविधान ने जातिप्रथा की नकारात्मकता को दूर करने का प्रयास किया।
प्रश्न 04 : भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका एवं महत्व को स्पष्ट कीजिए
1. प्रस्तावना
भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की लगभग 65% जनसंख्या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। कृषि न केवल रोजगार का प्रमुख स्रोत है बल्कि यह राष्ट्रीय आय, खाद्य सुरक्षा, औद्योगिक विकास और विदेशी व्यापार में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है। इसलिए कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ (Backbone) कहा जाता है।
2. भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका
(क) राष्ट्रीय आय में योगदान
- स्वतंत्रता के समय राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान लगभग 50% था।
- वर्तमान में यह घटकर लगभग 17-18% (2024 के आँकड़े) रह गया है, फिर भी इसका महत्व बना हुआ है।
(ख) रोजगार का मुख्य साधन
- ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 45-50% कार्यबल कृषि क्षेत्र में कार्यरत है।
- इससे बेरोजगारी की समस्या कम होती है।
(ग) खाद्य सुरक्षा
- कृषि से ही देश की बढ़ती हुई जनसंख्या को अनाज, फल, सब्जियाँ, दालें, दूध आदि उपलब्ध होते हैं।
- आत्मनिर्भरता के लिए खाद्य उत्पादन अत्यंत आवश्यक है।
(घ) औद्योगिक विकास में योगदान
- अनेक उद्योग सीधे-सीधे कृषि पर निर्भर हैं जैसे—कपास उद्योग, गन्ना उद्योग, जूट उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग।
- कृषि कच्चा माल (Raw Material) उपलब्ध कराकर उद्योगों की नींव मजबूत करती है।
(ङ) पूंजी निर्माण
- कृषि से प्राप्त अधिशेष आय का उपयोग बचत और निवेश में किया जाता है।
- इससे पूंजी निर्माण होता है और अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है।
(च) विदेशी व्यापार में योगदान
- भारत के चाय, कॉफी, मसाले, कपास, तंबाकू, जूट आदि कृषि उत्पाद विदेशों में निर्यात किए जाते हैं।
- कृषि निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जित होती है।
(छ) ग्रामीण विकास का आधार
- कृषि उत्पादन बढ़ने से ग्रामीण बाजारों में क्रय-शक्ति बढ़ती है।
- सड़क, सिंचाई, परिवहन, ग्रामीण बैंक और सहकारी समितियाँ कृषि के कारण ही विकसित हुई हैं।
3. भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व
- रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत → ग्रामीण भारत की आजीविका कृषि पर आधारित है।
- गरीबी उन्मूलन → कृषि विकास से किसानों की आय बढ़ती है और गरीबी घटती है।
- सामाजिक स्थिरता → कृषि ग्रामीण समाज को संगठित करती है।
- पर्यावरण संरक्षण → पारंपरिक कृषि पद्धतियाँ पर्यावरण संतुलन बनाए रखती हैं।
- आर्थिक संतुलन → उद्योग और सेवा क्षेत्र का विकास भी कृषि की प्रगति पर निर्भर करता है।
4. निष्कर्ष
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और केंद्रीय है। यह न केवल भोजन और रोजगार देती है बल्कि औद्योगिक कच्चा माल, विदेशी मुद्रा और राष्ट्रीय आय में भी योगदान करती है। अतः भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए कृषि क्षेत्र का आधुनिकीकरण, वैज्ञानिक खेती, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार और किसानों की आय में वृद्धि ही आर्थिक प्रगति का आधार है।
प्रश्न 05 : मार्ले–मिन्टो सुधार अधिनियम (1909 ई.)
1. प्रस्तावना
ब्रिटिश शासनकाल में भारतीयों की बढ़ती राजनीतिक चेतना एवं राष्ट्रीय आंदोलन के दबाव को देखते हुए ब्रिटिश सरकार को कुछ सुधार करने पड़े। इसी क्रम में 1909 ई. में भारतीय परिषद अधिनियम (Indian Councils Act, 1909) पारित हुआ, जिसे प्रायः मार्ले–मिन्टो सुधार अधिनियम कहा जाता है।
- लॉर्ड मिन्टो : उस समय भारत के वायसराय।
- जॉन मोर्ले (Morley) : उस समय भारत सचिव।
इन्हीं दोनों के नाम पर यह अधिनियम प्रसिद्ध हुआ।
2. अधिनियम के प्रमुख प्रावधान
(क) केंद्रीय स्तर पर
- केंद्रीय विधान परिषद (Imperial Legislative Council) के सदस्यों की संख्या 16 से बढ़ाकर 60 कर दी गई।
- प्रथम बार अप्रत्यक्ष चुनाव (Indirect Election) की व्यवस्था की गई।
- परिषद के सदस्य बजट पर चर्चा कर सकते थे, किंतु उसे स्वीकृत या अस्वीकृत नहीं कर सकते थे।
- प्रश्न पूछने एवं पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया।
(ख) प्रांतीय स्तर पर
- प्रांतीय विधान परिषदों का आकार भी बढ़ाया गया।
- कुछ प्रांतों (बंगाल, बंबई, मद्रास, संयुक्त प्रांत) में गैर-सरकारी बहुमत की व्यवस्था की गई।
- प्रांतीय परिषदों को स्थानीय विषयों पर अधिक चर्चा की अनुमति दी गई।
(ग) पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorate)
- मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorate) की व्यवस्था की गई।
- इसका अर्थ था कि मुसलमान केवल मुसलमान उम्मीदवार को ही वोट देंगे।
- यह प्रावधान बाद में सांप्रदायिक राजनीति और हिंदू–मुस्लिम अलगाव का आधार बना।
3. महत्व
- भारतीयों को सीमित राजनीतिक अधिकार मिले।
- प्रथम बार चुनाव पद्धति (Electoral System) की शुरुआत हुई।
- भारतीय नेताओं को विधान परिषदों में चर्चा का अवसर मिला।
- यह अधिनियम भारतीय राजनीति में नए युग का आरंभ माना जाता है।
4. आलोचना
- बहुत ही सीमित अधिकार दिए गए, वास्तविक शक्ति ब्रिटिश सरकार के हाथ में रही।
- बजट पर मतदान का अधिकार नहीं था, केवल चर्चा तक सीमित।
- पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था ने सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया।
- भारतीय नेताओं ने इसे “बांटो और राज करो” की नीति बताया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसे असंतोषजनक एवं अपूर्ण सुधार कहा।
5. निष्कर्ष
मार्ले–मिन्टो सुधार अधिनियम 1909 ने भारतीय राजनीति में प्रतिनिधित्व और चुनाव व्यवस्था की शुरुआत की, किंतु इसके साथ ही पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था ने आने वाले समय में भारतीय समाज में विभाजन की गहरी रेखा खींच दी। यह अधिनियम ब्रिटिश सरकार की औपनिवेशिक हित-सुरक्षा तथा भारतीयों को सीमित राजनीतिक संतोष देने की नीति का उदाहरण था।
प्रश्न 06 : भारत में कन्या भ्रूणहत्या के प्रचलन पर संक्षिप्त टिप्पणी
1. प्रस्तावना
भारत जैसे परंपरागत समाज में पुत्र को वंश चलाने वाला और बुढ़ापे का सहारा माना गया है, जबकि कन्या को अक्सर आर्थिक बोझ समझा गया। इसी मानसिकता से प्रेरित होकर कन्या भ्रूणहत्या (Female Foeticide) जैसी कुप्रथा का जन्म हुआ। यह वह अमानवीय प्रक्रिया है जिसमें गर्भ में पल रही कन्या शिशु की हत्या कर दी जाती है।
2. कन्या भ्रूणहत्या के कारण
- सामाजिक कारण – पितृसत्तात्मक सोच, पुत्र को श्रेष्ठ मानना।
- आर्थिक कारण – दहेज प्रथा, कन्या को “पराया धन” मानना।
- सांस्कृतिक कारण – धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठानों में पुत्र की महत्ता।
- तकनीकी कारण – अल्ट्रासाउंड तकनीक के दुरुपयोग से भ्रूण का लिंग पता लगाना।
- शिक्षा व जागरूकता की कमी – महिलाएँ और परिवार अपने अधिकार व कुप्रथा के दुष्परिणाम से अनभिज्ञ।
3. प्रभाव / दुष्परिणाम
- लिंगानुपात में असंतुलन – जनगणना 2011 में 0–6 वर्ष आयु वर्ग का लिंगानुपात मात्र 919 प्रति 1000 पुरुष रहा।
- समाज में असंतुलन – विवाह योग्य स्त्रियों की कमी, बाल विवाह व मानव तस्करी की समस्या।
- महिलाओं की स्थिति कमजोर – कन्या जन्म पर रोक से महिला का सम्मान और अधिकार प्रभावित।
- नैतिक पतन – यह मानवाधिकारों का उल्लंघन और अमानवीय कृत्य है।
4. रोकथाम हेतु प्रयास
- कानूनी प्रावधान –
- भ्रूण परीक्षण तकनीक (PCPNDT) अधिनियम, 1994।
- कन्या भ्रूणहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध।
- सरकारी योजनाएँ –
- “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान।
- “सुकन्या समृद्धि योजना”।
- सामाजिक सुधार – दहेज प्रथा पर रोक, स्त्री शिक्षा व सशक्तिकरण को बढ़ावा।
- जागरूकता अभियान – समाज में कन्या जन्म को गौरवपूर्ण बनाने के लिए जनजागरण।
5. निष्कर्ष
कन्या भ्रूणहत्या केवल महिलाओं के प्रति भेदभाव नहीं बल्कि संपूर्ण समाज और मानवता के लिए गंभीर संकट है। इसे रोकने के लिए कानून, शिक्षा, सामाजिक सुधार और मानसिकता परिवर्तन – चारों स्तरों पर प्रयास आवश्यक हैं। जब तक समाज कन्या को समान अधिकार और सम्मान नहीं देगा, तब तक वास्तविक प्रगति संभव नहीं है।
प्रश्न 07 : भारत में आतंकवाद की समस्या
1. प्रस्तावना
आतंकवाद (Terrorism) विश्वव्यापी समस्या है, लेकिन भारत में यह विशेष रूप से गंभीर है। आतंकवाद का अर्थ है – राजनीतिक, धार्मिक अथवा वैचारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हिंसा, भय और आतंक का प्रयोग। भारत में आतंकवाद की समस्या सीमापार आतंकवाद, अलगाववाद, सांप्रदायिक उग्रवाद, वामपंथी उग्रवाद आदि रूपों में देखने को मिलती है।
2. भारत में आतंकवाद के प्रमुख स्वरूप
- सीमापार आतंकवाद – पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद विशेषकर जम्मू-कश्मीर में (जैसे 2001 संसद हमला, 2008 मुंबई हमला, पुलवामा हमला 2019)।
- क्षेत्रीय / अलगाववादी आतंकवाद –
- उत्तर-पूर्व राज्यों में (ULFA, NSCN जैसे संगठन)।
- पंजाब में खालिस्तान आंदोलन।
- सांप्रदायिक आतंकवाद – धार्मिक आधार पर कट्टरपंथी संगठनों की हिंसा।
- वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) – छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और बिहार के कई हिस्सों में सक्रिय।
- साइबर आतंकवाद – इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से आतंकी गतिविधियों का प्रसार।
3. आतंकवाद के कारण
- राजनीतिक कारण – पड़ोसी देशों की शत्रुतापूर्ण नीति, आंतरिक अलगाववादी आंदोलन।
- सामाजिक कारण – धार्मिक कट्टरता, सांप्रदायिकता, जातिगत असमानता।
- आर्थिक कारण – गरीबी, बेरोजगारी, पिछड़ापन और संसाधनों का असमान वितरण।
- वैश्विक कारण – अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों (जैसे अल-कायदा, आई.एस.आई.एस.) का प्रभाव।
- सीमा और भू-राजनीतिक स्थिति – भारत की लंबी और संवेदनशील सीमाएँ।
4. आतंकवाद के दुष्परिणाम
- राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा – सैनिकों व नागरिकों की जान हानि।
- आर्थिक नुकसान – पर्यटन, उद्योग और निवेश प्रभावित।
- सामाजिक अस्थिरता – सांप्रदायिक सद्भावना और सामाजिक एकता में कमी।
- राजनीतिक प्रभाव – आतंकवाद से निपटने के लिए आपात कदम, जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती।
- मानवाधिकार का उल्लंघन – निर्दोषों की हत्या और विस्थापन।
5. रोकथाम के उपाय
- कानूनी व प्रशासनिक कदम –
- UAPA (Unlawful Activities Prevention Act)।
- NIA (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) की स्थापना।
- सख्त सीमा प्रबंधन।
- आर्थिक व सामाजिक उपाय –
- पिछड़े क्षेत्रों का विकास, रोजगार और शिक्षा।
- नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचा और सुविधाएँ।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग – वैश्विक आतंकवाद पर संयुक्त राष्ट्र का सहयोग, अंतरराष्ट्रीय खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान।
- जनजागरण – कट्टरता व उग्रवाद से युवाओं को बचाने के लिए शिक्षा व सामाजिक जागरूकता।
6. निष्कर्ष
भारत में आतंकवाद केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास की बाधा भी है। इसे समाप्त करने के लिए सख्त सुरक्षा उपायों के साथ-साथ सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और शिक्षा पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। केवल हथियारों से नहीं बल्कि विकास और सद्भावना से ही आतंकवाद का स्थायी समाधान संभव है।
प्रश्न 08 : स्वतंत्र भारत में महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डालिए
1. प्रस्तावना
महिलाएँ किसी भी समाज की आधी आबादी होती हैं। भारत में स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही, और स्वतंत्रता प्राप्ति (1947) के बाद भारतीय संविधान ने महिलाओं को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार प्रदान किए। स्वतंत्र भारत में महिलाओं की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, किंतु अनेक चुनौतियाँ आज भी बनी हुई हैं।
2. संवैधानिक व कानूनी अधिकार
- समानता का अधिकार – अनुच्छेद 14, 15, 16 के अंतर्गत लिंगभेद के आधार पर भेदभाव निषिद्ध।
- शिक्षा का अधिकार – अनुच्छेद 21A के तहत 6–14 वर्ष तक की आयु की लड़कियों को निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा।
- सुरक्षा संबंधी कानून –
- दहेज निषेध अधिनियम, 1961
- घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005
- कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न निरोधक कानून, 2013
- राजनीतिक अधिकार – महिलाओं को मतदान और चुनाव लड़ने का समान अधिकार।
3. स्वतंत्र भारत में महिलाओं की उपलब्धियाँ
- शिक्षा के क्षेत्र में – महिला साक्षरता दर 1951 में केवल 8.86% थी, जो 2011 की जनगणना में बढ़कर 65% से अधिक हो गई।
- राजनीति में भागीदारी –
- इंदिरा गांधी (भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री)।
- राष्ट्रपति पद पर प्रतिभा पाटिल और द्रौपदी मुर्मू जैसी महिलाएँ।
- पंचायती राज संस्थाओं में 33% आरक्षण।
- रोजगार व आर्थिक क्षेत्र – बैंकिंग, आईटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सेना और अंतरिक्ष (कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स) में उल्लेखनीय योगदान।
- खेलों में सफलता – पी.टी. उषा, मैरीकॉम, सायना नेहवाल, मीराबाई चानू, पी.वी. सिंधु जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की महिला खिलाड़ी।
- सांस्कृतिक व सामाजिक योगदान – साहित्य, कला, सिनेमा और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी।
4. वर्तमान चुनौतियाँ
- लैंगिक भेदभाव – रोजगार, वेतन और अवसरों में असमानता।
- हिंसा व अपराध – बलात्कार, घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या जैसी समस्याएँ।
- साक्षरता व शिक्षा में अंतर – ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों की शिक्षा अभी भी चुनौतीपूर्ण।
- आर्थिक निर्भरता – ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों में महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता सीमित।
- सामाजिक रूढ़िवादिता – पितृसत्तात्मक मानसिकता, परंपरागत भूमिकाएँ।
5. सुधार एवं उपाय
- शिक्षा व कौशल विकास – “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन।
- राजनीतिक सशक्तिकरण – संसद और विधानसभाओं में 33% आरक्षण सुनिश्चित करना।
- आर्थिक सशक्तिकरण – स्वरोजगार, स्टार्टअप और उद्यमिता में महिलाओं को प्रोत्साहन।
- कानूनी व्यवस्था – अपराधों पर त्वरित न्याय और कड़ी सजा।
- सामाजिक जागरूकता – मीडिया और शिक्षा के माध्यम से समानता और सम्मान की संस्कृति का विकास।
6. निष्कर्ष
स्वतंत्र भारत में महिलाओं की स्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत और सम्मानजनक हुई है। संविधान, शिक्षा, रोजगार और राजनीति ने महिलाओं को सशक्त बनाया है। हालांकि अभी भी लैंगिक असमानता, हिंसा और रूढ़िवादी सोच जैसी बाधाएँ दूर करना शेष है।
यदि समाज, सरकार और परिवार मिलकर समानता की दिशा में कार्य करें तो महिला सशक्तिकरण भारत के विकास की सबसे बड़ी शक्ति बन सकता है।

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