UOU GEYS–01 Solved Paper December 2024 | Question Answers in Hindi
प्रश्न 01: योग का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: योग का अर्थ:
‘योग’ शब्द संस्कृत धातु “युज” से बना है, जिसका अर्थ है जोड़ना या मिलाना। योग का तात्पर्य आत्मा और परमात्मा के मिलन से है। यह केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि मानसिक, आत्मिक और आध्यात्मिक विकास का मार्ग है। योग के माध्यम से मनुष्य अपने शरीर, मन और आत्मा को संतुलित करता है और मोक्ष की प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है।
योग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
योग भारत की प्राचीनतम सांस्कृतिक धरोहरों में से एक है। इसकी उत्पत्ति वैदिक काल से मानी जाती है।
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वैदिक काल (1500 ई.पू. – 500 ई.पू.)
- ऋग्वेद और उपनिषदों में योग संबंधी अनेक उल्लेख मिलते हैं।
- योग को तप, ध्यान और समाधि के रूप में वर्णित किया गया है।
- उपनिषदों ने योग को ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का साधन माना।
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उपनिषद और गीता काल
- कठोपनिषद और श्वेताश्वतर उपनिषद में आत्मा-परमात्मा के मिलन का उपाय योग बताया गया।
- भगवद्गीता में योग के विभिन्न रूप—कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग—का विस्तृत वर्णन है।
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महर्षि पतंजलि (200 ई.पू. – 200 ई.)
- योग को वैज्ञानिक रूप में व्यवस्थित करने का श्रेय महर्षि पतंजलि को दिया जाता है।
- उन्होंने योगसूत्र की रचना की, जिसमें योग के आठ अंग (अष्टांग योग) बताए गए—
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। - इस काल से योग एक पूर्ण दर्शन (योग दर्शन) के रूप में स्थापित हुआ।
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मध्यकाल
- योग का संबंध भक्ति आंदोलन और तांत्रिक साधना से जोड़ा गया।
- नाथ योगियों (गोरखनाथ, मत्स्येंद्रनाथ आदि) ने हठयोग का विकास किया, जिसमें आसन और प्राणायाम पर विशेष बल दिया गया।
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आधुनिक काल
- आधुनिक समय में स्वामी विवेकानंद, स्वामी शिवानंद, महर्षि अरविंद, परमहंस योगानंद आदि महापुरुषों ने योग को विश्वभर में प्रचारित किया।
- आज योग को शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उत्थान का साधन माना जाता है।
- 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ मनाया जाता है, जिससे इसकी वैश्विक मान्यता सिद्ध होती है।
निष्कर्ष
योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण पद्धति है। इसका उद्देश्य मनुष्य को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से संतुलित कर अंततः मोक्ष की ओर ले जाना है। भारत की यह प्राचीन विधा आज पूरे विश्व में स्वास्थ्य और शांति का प्रतीक बन चुकी है।
प्रश्न 02: पातंजलि योगसूत्र के अनुसार पुरुष व प्रकृति के स्वरूप का समझाइए।
उत्तर:
महर्षि पातंजलि ने अपने योगसूत्र में सांख्य दर्शन के आधार पर पुरुष और प्रकृति के स्वरूप को स्पष्ट किया है। योगदर्शन का मूल उद्देश्य पुरुष (आत्मा) को प्रकृति (प्रकृति से उत्पन्न भौतिक जगत) से अलग करना है, ताकि कैवल्य (मोक्ष) की प्राप्ति हो सके।
1. पुरुष का स्वरूप
- अर्थ: पुरुष का अर्थ आत्मा, चेतन सत्ता या शुद्ध चैतन्य है।
- विशेषताएँ:
- पुरुष नित्य, शुद्ध, निराकार और चेतन स्वरूप है।
- यह न कर्म करता है, न भोग करता है; केवल साक्षी रूप में स्थित रहता है।
- यह न जन्म लेता है, न नष्ट होता है; यह अविनाशी और शाश्वत है।
- योगसूत्र के अनुसार पुरुष ही वास्तविक आत्मा है, जो अज्ञानवश प्रकृति से जुड़कर बंधन में पड़ता है।
2. प्रकृति का स्वरूप
- अर्थ: प्रकृति भौतिक जगत की मूल सत्ता है।
- विशेषताएँ:
- प्रकृति अचेतन और जड़ है।
- इसका आधार त्रिगुण हैं—
- सत्त्व (ज्ञान, शांति, प्रकाश)
- रजस (क्रिया, गति, इच्छा)
- तमस (अज्ञान, जड़ता, आलस्य)
- इन गुणों के संतुलन से प्रकृति की सृष्टि होती है।
- बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ और पंचमहाभूत—all प्रकृति की ही उत्पत्तियाँ हैं।
3. पुरुष और प्रकृति का संबंध
- पुरुष और प्रकृति दोनों अनादि और स्वतंत्र हैं।
- पुरुष चेतन है, परंतु अनुभव और भोग के लिए प्रकृति से जुड़ता है।
- अज्ञानवश पुरुष प्रकृति को ही अपना स्वरूप मान लेता है और बंधन में पड़ जाता है।
- योग का साधन करने से पुरुष अपनी शुद्ध सत्ता को पहचानता है और प्रकृति से अलग होकर कैवल्य (मोक्ष) की प्राप्ति करता है।
निष्कर्ष
पातंजलि योगसूत्र के अनुसार पुरुष शुद्ध, चेतन, अविनाशी आत्मा है, जबकि प्रकृति जड़, अचेतन और परिवर्तनशील सत्ता है। पुरुष का बंधन प्रकृति से तादात्म्य (अज्ञान) के कारण होता है और योगाभ्यास के द्वारा यह बंधन समाप्त कर पुरुष मोक्ष की प्राप्ति करता है।
प्रश्न 03: भक्ति योग एवं ज्ञान योग को विस्तारपूर्वक समझाइए।
उत्तर:
योग दर्शन में मुक्ति प्राप्त करने के अनेक मार्ग बताए गए हैं, जिनमें प्रमुख हैं – भक्ति योग और ज्ञान योग। ये दोनों ही मार्ग मनुष्य को परमात्मा की प्राप्ति की ओर ले जाते हैं, किंतु इनके साधन और दृष्टिकोण भिन्न हैं।
1. भक्ति योग
परिभाषा:
‘भक्ति’ का अर्थ है – ईश्वर के प्रति प्रेम, श्रद्धा और पूर्ण समर्पण। जिस साधन के माध्यम से साधक अपने समस्त कर्म, विचार और भावनाएँ ईश्वर को अर्पित करता है, उसे भक्ति योग कहते हैं।
विशेषताएँ:
- इसमें साधक ईश्वर को अपना मित्र, पिता, माता या प्रियतम मानकर उनसे गहन संबंध स्थापित करता है।
- भक्ति योग में ज्ञान या कर्म की अपेक्षा श्रद्धा और प्रेम को प्रधानता दी जाती है।
- साधक ‘अहंकार’ का त्याग कर पूर्ण समर्पण करता है।
- भगवद्गीता (अध्याय 12) में भगवान श्रीकृष्ण ने भक्ति योग को श्रेष्ठतम योग कहा है।
भक्ति के प्रकार:
- सगुण भक्ति – ईश्वर को साकार रूप (राम, कृष्ण, देवी-देवता) मानकर भक्ति करना।
- निर्गुण भक्ति – ईश्वर को निराकार, निर्गुण मानकर भक्ति करना।
भक्ति योग का फल:
- साधक के हृदय से अज्ञान और अहंकार का नाश होता है।
- मन शुद्ध होता है और ईश्वर की अनुग्रह से मोक्ष प्राप्त होता है।
2. ज्ञान योग
परिभाषा:
ज्ञान योग वह मार्ग है, जिसमें साधक वास्तविक आत्मा और अवास्तविक शरीर-पदार्थ के बीच भेद कर सत्य ज्ञान प्राप्त करता है। यह मार्ग विवेक (भेदज्ञान) और आत्मचिंतन पर आधारित है।
विशेषताएँ:
- साधक यह अनुभव करता है कि “मैं शरीर या मन नहीं, अपितु शुद्ध आत्मा हूँ।”
- आत्मा और परमात्मा की एकता का बोध ही ज्ञान योग का लक्ष्य है।
- इसमें श्रवण, मनन और निदिध्यासन (सत्य का सुनना, चिंतन करना और गहराई से मनन करना) मुख्य साधन हैं।
- उपनिषद और अद्वैत वेदांत (आदि शंकराचार्य) ने ज्ञान योग को मुक्ति का सर्वोत्तम साधन बताया है।
ज्ञान योग का फल:
- अज्ञान (अविद्या) का नाश होता है।
- आत्मा की शुद्ध सत्ता का अनुभव होता है।
- साधक जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है।
3. भक्ति योग और ज्ञान योग का तुलनात्मक स्वरूप
| आधार | भक्ति योग | ज्ञान योग |
|---|---|---|
| मुख्य साधन | प्रेम, श्रद्धा और समर्पण | विवेक, आत्मचिंतन और सत्यज्ञान |
| दृष्टिकोण | ईश्वर को अपना प्रिय मानकर उससे मिलन की चाह | आत्मा और परमात्मा की एकता का अनुभव |
| प्रभाव | हृदय शुद्ध और अहंकार का नाश | अज्ञान का नाश और आत्मबोध |
| शास्त्रीय आधार | भगवद्गीता, भक्तिकालीन साहित्य | उपनिषद, अद्वैत वेदांत |
| लक्ष्य | ईश्वर की कृपा से मुक्ति | आत्मज्ञान से मुक्ति |
निष्कर्ष
भक्ति योग और ज्ञान योग दोनों ही मोक्ष की ओर ले जाने वाले श्रेष्ठ मार्ग हैं। जहाँ भक्ति योग भावनाओं और ईश्वर-प्रेम पर आधारित है, वहीं ज्ञान योग विवेक और आत्मज्ञान पर। वास्तव में, दोनों का समन्वय ही मनुष्य को पूर्णता और मुक्ति की ओर ले जाता है।
प्रश्न 04: चित्त प्रसाधन के उपायों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महर्षि पातंजलि ने योगसूत्र (अध्याय–1, सूत्र 33) में चित्त की शुद्धि और स्थिरता के लिए चार उपाय बताए हैं। इन उपायों को चित्त प्रसाधन के उपाय कहा जाता है। इनके अभ्यास से साधक का मन शांत, निर्मल और प्रसन्न रहता है।
चित्त प्रसाधन के चार उपाय
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मैत्री (मित्रता भाव)
- दूसरों के प्रति मित्रता और सहयोग की भावना रखना।
- ईर्ष्या, द्वेष और घृणा से बचकर सद्भावनापूर्ण संबंध स्थापित करना।
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करुणा (दया भाव)
- दुखी और पीड़ित प्राणियों के प्रति दया और सहानुभूति रखना।
- करुणा से हृदय की कठोरता दूर होती है और मन को शांति मिलती है।
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मुदिता (प्रसन्नता भाव)
- दूसरों की सफलता और सुख देखकर प्रसन्न होना।
- इससे ईर्ष्या और असंतोष का नाश होता है तथा चित्त निर्मल होता है।
-
उपेक्षा (समभाव भाव)
- अधर्म और अन्याय करने वालों के प्रति तटस्थता और समभाव रखना।
- क्रोध या प्रतिशोध की भावना न रखकर उनके कर्मों की उपेक्षा करना।
निष्कर्ष
चित्त प्रसाधन के इन चार उपायों—मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा—का अभ्यास करने से साधक का मन शांत, निर्मल और प्रसन्न रहता है। यह योग साधना में एकाग्रता और आत्मिक उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक है।
प्रश्न 05: श्री अरविन्द की योग के क्षेत्र में भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
श्री अरविन्द (1872–1950) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, दार्शनिक, कवि और योगी थे। उन्होंने योग को आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुसार नया स्वरूप दिया। उनके योग को “समन्वय योग” (Integral Yoga) कहा जाता है। इसमें उन्होंने पारंपरिक योग पद्धतियों को मिलाकर एक पूर्ण आध्यात्मिक साधना का मार्ग प्रस्तुत किया।
श्री अरविन्द की योग संबंधी भूमिका
1. समन्वय योग (Integral Yoga) की संकल्पना
- श्री अरविन्द ने योग को केवल मोक्ष तक सीमित नहीं किया, बल्कि जीवन के संपूर्ण परिवर्तन का साधन माना।
- उनका उद्देश्य था – मानव जीवन को दैवी जीवन में रूपांतरित करना।
- उन्होंने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्ति योग—तीनों का समन्वय कर “समन्वय योग” प्रस्तुत किया।
2. योग का लक्ष्य
- पारंपरिक योग का लक्ष्य व्यक्तिगत मुक्ति (मोक्ष) था।
- अरविन्द के अनुसार योग का लक्ष्य मानव चेतना का उत्कर्ष और पृथ्वी पर दैवी जीवन की स्थापना है।
3. साधना की प्रक्रिया
- उन्होंने योग की साधना को जीवन का अभिन्न अंग माना।
- उनके अनुसार साधना केवल जंगल या मठ में नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन में रहते हुए भी की जा सकती है।
- योग साधना के लिए उन्होंने तीन प्रमुख साधन बताए:
- समर्पण – अपने अहंकार को ईश्वर को अर्पित करना।
- परिवर्तन – शरीर, मन और आत्मा का शुद्धिकरण।
- अध्यात्मिक विकास – उच्च चेतना (सुप्रमेण्टल कॉन्शसनेस) की ओर बढ़ना।
4. सुप्रमेण्टल चेतना का सिद्धांत
- श्री अरविन्द ने कहा कि मनुष्य में केवल मानसिक चेतना नहीं है, बल्कि वह सुप्रमेण्टल चेतना तक पहुँच सकता है।
- यह चेतना मनुष्य को दैवी सत्ता के करीब ले जाती है।
5. विश्व स्तर पर योगदान
- श्री अरविन्द ने पांडिचेरी (पुडुचेरी) में आश्रम स्थापित किया, जो आज भी योग और अध्यात्म का केंद्र है।
- उनकी शिष्या ‘माँ (मीरा अल्फासा)’ ने उनके योग सिद्धांतों को आगे बढ़ाया।
निष्कर्ष
श्री अरविन्द ने योग को जीवन-परिवर्तन का साधन बताया और “समन्वय योग” द्वारा इसे आधुनिक समाज के लिए उपयोगी बनाया। उन्होंने योग को केवल मोक्ष तक सीमित न रखकर उसे मानवता के आध्यात्मिक उत्थान और दैवी जीवन की प्राप्ति का माध्यम बनाया। इस प्रकार उनकी भूमिका योग के क्षेत्र में नवीन, वैज्ञानिक और सार्वभौमिक मानी जाती है।
Short Answer Type Questions
प्रश्न 01: योग का सामान्य अर्थ एवं परिभाषा बताइए।
उत्तर :
योग का सामान्य अर्थ
‘योग’ शब्द संस्कृत धातु “युज” से बना है, जिसका अर्थ है जोड़ना, मिलाना या एकत्व स्थापित करना। योग का तात्पर्य है – व्यक्तिगत आत्मा (जीवात्मा) और परमात्मा (परम चेतना) का मिलन।
योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि यह जीवन जीने की एक समग्र पद्धति है, जिसमें शरीर, मन और आत्मा का सामंजस्य स्थापित होता है।
- सामान्य रूप से योग का अर्थ मन और इंद्रियों पर नियंत्रण तथा आत्मिक उन्नति है।
- योग शरीर को स्वस्थ, मन को शांत और आत्मा को शुद्ध बनाता है।
- यह भौतिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन के बीच संतुलन स्थापित करता है।
योग की परिभाषाएँ
विभिन्न ग्रंथों और आचार्यों ने योग की अपनी-अपनी परिभाषाएँ दी हैं—
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पतंजलि योगसूत्र
- “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”
- अर्थात् चित्त की वृत्तियों (मन की चंचलता) को रोकना ही योग है।
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भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 48)
- “समत्वं योग उच्यते।”
- अर्थात् सफलता और असफलता में समभाव रखना ही योग है।
-
कठोपनिषद
- योग को इंद्रियों और मन की स्थिरता तथा आत्मा और परमात्मा के मिलन का साधन बताया गया है।
-
स्वामी विवेकानंद
- “योग का अर्थ है – मनुष्य की अंतर्निहित शक्तियों का सामंजस्यपूर्ण विकास।”
योग का महत्व (संक्षेप में)
- शारीरिक स्वास्थ्य और रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि।
- मानसिक शांति और एकाग्रता।
- आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति।
- सामाजिक और नैतिक जीवन का विकास।
निष्कर्ष
इस प्रकार, योग का सामान्य अर्थ है – आत्मा और परमात्मा का मिलन तथा शरीर, मन और आत्मा का सामंजस्य।
पतंजलि योगसूत्र में योग को चित्तवृत्तियों का निरोध कहा गया है, जबकि गीता में इसे समत्व माना गया है। वास्तव में योग केवल साधना नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन-पद्धति है, जो मनुष्य को स्वस्थ, संतुलित और आध्यात्मिक बनाती है।
प्रश्न 02: हठप्रदीपिका के अनुसार किन्हीं दो आसनों की विधि एवं लाभ बताइए।
उत्तर:
हठयोग का प्रमुख ग्रंथ “हठप्रदीपिका” (स्वात्माराम योगी द्वारा रचित) है। इसमें अनेक आसनों का वर्णन मिलता है। यहाँ दो प्रमुख आसनों की विधि और उनके लाभ बताए जा रहे हैं:
1. पद्मासन (Lotus Pose)
(क) विधि:
- भूमि पर दरी या आसन बिछाकर बैठ जाएँ।
- बाएँ पैर को दाहिनी जाँघ पर और दाएँ पैर को बाईं जाँघ पर रखें।
- दोनों हथेलियों को घुटनों पर रखें, अंगूठा और तर्जनी को मिलाकर ज्ञान मुद्रा बनाएँ।
- रीढ़ की हड्डी सीधी रखें और दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर रखें।
- श्वास-प्रश्वास को सामान्य रखते हुए ध्यान लगाएँ।
(ख) लाभ:
- ध्यान और प्राणायाम के लिए सर्वश्रेष्ठ आसन।
- मन को स्थिर और एकाग्र करता है।
- पेट, रीढ़ और स्नायु तंत्र को शक्ति प्रदान करता है।
- मानसिक तनाव और चिंता को दूर करता है।
2. भुजंगासन (Cobra Pose)
(क) विधि:
- भूमि पर पेट के बल लेट जाएँ।
- पैरों को सीधा रखें और हथेलियाँ छाती के पास भूमि पर टिकाएँ।
- गहरी श्वास लेते हुए धीरे-धीरे सिर, गर्दन और छाती को ऊपर उठाएँ।
- नाभि तक का भाग भूमि से सटा रहे।
- कुछ क्षण इसी अवस्था में रुकें और फिर धीरे-धीरे पूर्व स्थिति में आ जाएँ।
(ख) लाभ:
- रीढ़ की हड्डी को लचीला और मजबूत बनाता है।
- फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है।
- पेट की चर्बी कम करने में सहायक।
- कब्ज, गैस और अपच जैसी समस्याओं को दूर करता है।
- पीठ दर्द और कंधे की जकड़न में लाभकारी।
✦ निष्कर्ष
हठप्रदीपिका के अनुसार पद्मासन मन और ध्यान को स्थिर करने के लिए उत्तम है, जबकि भुजंगासन शरीर को स्वस्थ और रीढ़ को लचीला बनाने के लिए लाभकारी है। दोनों का नियमित अभ्यास साधक को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।
प्रश्न 03: नादानुसंधान की अवस्थाओं को संक्षिप्त में समझाइए।
उत्तर:
नादानुसंधान हठयोग की एक महत्वपूर्ण साधना है। इसमें साधक आंतरिक नाद (ध्वनि) पर ध्यान केंद्रित करता है। धीरे–धीरे साधक बाहरी शोर से मुक्त होकर अपने अंतर नाद को सुनने लगता है। हठप्रदीपिका में नादानुसंधान की चार अवस्थाएँ बताई गई हैं।
✦ नादानुसंधान की अवस्थाएँ
-
आरम्भ अवस्था (प्रारंभिक अवस्था)
- साधक को अलग–अलग बाहरी और आंतरिक ध्वनियाँ सुनाई देती हैं।
- मन धीरे–धीरे एकाग्र होने लगता है।
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घटा अवस्था (मध्य अवस्था)
- साधक को भीतर मधुर ध्वनियाँ सुनाई देती हैं (जैसे घंटी, वीणा, बांसुरी)।
- मन स्थिर होकर आंतरिक शांति का अनुभव करने लगता है।
-
परिचय अवस्था (उच्च अवस्था)
- साधक को अंतरिक्ष में केवल एक सूक्ष्म नाद का अनुभव होता है।
- चित्त की चंचलता कम हो जाती है और साधक आत्मानुभूति के करीब पहुँच जाता है।
-
निष्पत्ति अवस्था (परम अवस्था)
- साधक सभी प्रकार की ध्वनियों से परे शून्य नाद में स्थित हो जाता है।
- इस अवस्था में आत्मा और परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
- यह कैवल्य या मोक्ष की स्थिति मानी जाती है।
✦ निष्कर्ष
नादानुसंधान की चार अवस्थाएँ—आरम्भ, घटा, परिचय और निष्पत्ति—साधक को धीरे-धीरे बाहरी ध्वनि से आंतरिक नाद और अंततः परमात्मा के अनुभव तक ले जाती हैं। यह साधना योग के उच्चतम आध्यात्मिक अनुभव का मार्ग है।
प्रश्न 04: घेरंड संहिता के अनुसार भ्रामरी एवं उज्जायी प्राणायाम की विधि एवं लाभ बताइए।
उत्तर:
घेरंड संहिता हठयोग का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें सात प्रकार की साधनाओं का वर्णन है, जिनमें प्राणायाम भी प्रमुख है। यहाँ भ्रामरी और उज्जायी प्राणायाम की विधि और लाभ बताए जा रहे हैं:
1. भ्रामरी प्राणायाम
(क) विधि:
- सुखासन या पद्मासन में बैठें।
- दोनों कानों को अंगूठों से बंद करें और बाकी उंगलियाँ आँखों व नाक पर हल्के से रखें।
- गहरी श्वास लेकर श्वास को धीरे-धीरे छोड़ें।
- श्वास छोड़ते समय मधुमक्खी के गूंजने जैसी ध्वनि करें।
- इसे कई बार दोहराएँ।
(ख) लाभ:
- मन को तुरंत शांत और स्थिर करता है।
- क्रोध, तनाव और चिंता को दूर करता है।
- ध्यान और एकाग्रता बढ़ाता है।
- नींद की समस्या (अनिद्रा) में लाभकारी।
2. उज्जायी प्राणायाम
(क) विधि:
- आरामदायक आसन में बैठें।
- गले को थोड़ा संकुचित करते हुए नासिका से धीरे-धीरे श्वास लें।
- श्वास लेते समय हल्की घरघराहट जैसी ध्वनि गले में उत्पन्न हो।
- श्वास को कुछ समय तक रोकें और फिर धीरे-धीरे छोड़ें।
- अभ्यास को नियमित रूप से करें।
(ख) लाभ:
- फेफड़ों और श्वसन तंत्र को मजबूत करता है।
- रक्त संचार और पाचन क्रिया को सुधारता है।
- थायरॉयड और गले की बीमारियों में लाभकारी।
- शरीर में ऊर्जा और गर्माहट उत्पन्न करता है।
- मन को एकाग्र करता है और ध्यान में सहायक है।
✦ निष्कर्ष
घेरंड संहिता के अनुसार भ्रामरी प्राणायाम मानसिक शांति और ध्यान के लिए उपयोगी है, जबकि उज्जायी प्राणायाम श्वसन तंत्र को सशक्त बनाकर शरीर को ऊर्जावान और स्वस्थ करता है। दोनों का नियमित अभ्यास साधक को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्रदान करता है।
प्रश्न 05: पंचक्लेश क्या है? समझाइए।
उत्तर:
महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र (साधनपाद, सूत्र 2.3) में पाँच प्रकार के क्लेशों का उल्लेख किया है, जिन्हें पंचक्लेश कहा जाता है।
“अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः।”
क्लेश का अर्थ है — वह कारण जो दुख, बंधन और अशांति उत्पन्न करता है।
योग का उद्देश्य इन क्लेशों को दूर कर आत्मा को शुद्ध और स्वतंत्र करना है।
✦ पंचक्लेश और उनका विवरण
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अविद्या (अज्ञान)
- वास्तविक सत्य (आत्मा और परमात्मा का ज्ञान) न होना।
- नश्वर को शाश्वत मानना, दुःख को सुख समझना, अशुद्ध को शुद्ध मानना ही अविद्या है।
- यह सभी क्लेशों की जड़ है।
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अस्मिता (अहंकार)
- आत्मा और बुद्धि में भेद न कर पाना।
- “मैं ही कर्ता हूँ, मैं ही भोगी हूँ” की भावना।
- अहंकार से मनुष्य बंधन में फँसता है।
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राग (आसक्ति)
- सुखद अनुभवों या वस्तुओं से अत्यधिक लगाव।
- यह मनुष्य को मोह और बंधन में डालता है।
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द्वेष (घृणा/वैरभाव)
- दुखद अनुभवों और अप्रिय वस्तुओं से घृणा या नफरत की भावना।
- इससे क्रोध, हिंसा और मानसिक अशांति उत्पन्न होती है।
-
अभिनिवेश (मृत्यु का भय / जीवन-लालसा)
- मृत्यु के भय से जीवन के प्रति अत्यधिक मोह।
- यह क्लेश सबसे गहरा है, जो ज्ञानी और अज्ञानी सभी में पाया जाता है।
✦ निष्कर्ष
अतः पंचक्लेश हैं — अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश।
ये पाँचों ही मानव जीवन के दुख और बंधन के कारण हैं। योग साधना का उद्देश्य इन क्लेशों का नाश कर मनुष्य को मोक्ष और आत्मिक शांति की ओर ले जाना है।
प्रश्न 06: पातंजल योगसूत्र के अनुसार क्रियायोग को संक्षिप्त में समझाइए।
उत्तर:
महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र (साधनपाद, सूत्र 2.1) में क्रियायोग का वर्णन किया है—
“तपः स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥”
अर्थात् — तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान — ये तीन ही क्रियायोग हैं।
✦ क्रियायोग के तीन अंग
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तप (Self-discipline / संयम)
- शरीर और मन की शुद्धि के लिए अनुशासन।
- कठिनाइयों को सहन करते हुए साधना करना।
- इसका उद्देश्य इच्छाओं पर नियंत्रण और आत्मशुद्धि है।
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स्वाध्याय (Self-study / आत्मअध्ययन)
- वेद, शास्त्रों और आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन।
- साथ ही “सोऽहम्, अहं ब्रह्मास्मि” जैसे मंत्रों का जप।
- यह आत्मचिंतन और आत्मज्ञान का साधन है।
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ईश्वरप्रणिधान (Surrender to God / ईश्वर-समर्पण)
- अपने कर्मों के फल को ईश्वर को समर्पित करना।
- अहंकार का त्याग करके भक्ति और श्रद्धा से ईश्वर का स्मरण करना।
✦ क्रियायोग का उद्देश्य
- चित्त की शुद्धि और स्थिरता प्राप्त करना।
- क्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) का क्षय करना।
- समाधि और आत्मज्ञान के मार्ग को सरल बनाना।
✅ इस प्रकार, पातंजल योगसूत्र के अनुसार क्रियायोग साधक को अनुशासन, आत्मचिंतन और ईश्वर-भक्ति के मार्ग से मोक्ष और आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाता है।
प्रश्न 07: श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार भक्त के प्रकार बताइए।
उत्तर:
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 7, श्लोक 16) में भगवान श्रीकृष्ण ने चार प्रकार के भक्तों का उल्लेख किया है। श्लोक इस प्रकार है—
“चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥”
अर्थात् — हे अर्जुन! चार प्रकार के भक्त मेरी भक्ति करते हैं – आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी।
✦ भक्तों के प्रकार
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आर्त भक्त (पीड़ित भक्त)
- जो दुख, संकट, रोग या कष्ट में होकर भगवान को स्मरण करता है।
- इसका उद्देश्य दुःख से मुक्ति पाना होता है।
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जिज्ञासु भक्त (ज्ञान की खोज करने वाला)
- जो सत्य, आत्मा और भगवान के स्वरूप को जानने की जिज्ञासा से भक्ति करता है।
- यह भक्त ज्ञान प्राप्ति के लिए भगवान की शरण में जाता है।
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अर्थार्थी भक्त (संपत्ति व सुख चाहने वाला)
- जो धन, समृद्धि, पद-प्रतिष्ठा, संतान या सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए भगवान की उपासना करता है।
- इसका लक्ष्य सांसारिक लाभ प्राप्त करना होता है।
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ज्ञानी भक्त (तत्त्वज्ञानी, सच्चा भक्त)
- जो भगवान को ही परम सत्य और आत्मा का स्वरूप जानकर उनकी निस्वार्थ भक्ति करता है।
- यह भक्त मोक्ष की ओर अग्रसर होता है और भगवान को सबसे प्रिय होता है।
✦ निष्कर्ष
अतः श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार भक्त चार प्रकार के होते हैं — आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी। इनमें से ज्ञानी भक्त सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि उसकी भक्ति निस्वार्थ और भगवान के वास्तविक स्वरूप को जानने वाली होती है।
प्रश्न 08: घेरंड संहिता के अनुसार कपालभाति क्रिया के प्रकार एवं लाभ बताइए।
उत्तर:
घेरंड संहिता में षट्कर्म (छः शुद्धिकरण क्रियाएँ) का वर्णन मिलता है। इन्हीं में से एक है — कपालभाति क्रिया।
“कपाल” = माथा/मस्तिष्क,
“भाति” = प्रकाश/तेज।
अर्थात्, यह क्रिया मस्तिष्क को तेजस्वी और शुद्ध बनाने वाली है।
✦ कपालभाति क्रिया के प्रकार (घेरंड संहिता के अनुसार)
घेरंड संहिता (प्रथम उपदेश) में कपालभाति के तीन प्रकार बताए गए हैं —
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वातक्रमा कपालभाति
- इसमें बाएँ नासापुट से श्वास लेकर दाएँ से छोड़ना और दाएँ से लेकर बाएँ से छोड़ना होता है।
- यह नाड़ीशुद्धि की क्रिया के समान है।
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व्यात्क्रमा कपालभाति
- इसमें नाक से पानी खींचकर मुँह से बाहर निकाला जाता है।
- यह नासिका मार्ग और कण्ठ को शुद्ध करता है।
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शीत्क्रमा कपालभाति
- इसमें मुँह से पानी खींचकर नाक से बाहर निकाला जाता है।
- इससे श्वसन तंत्र शुद्ध और शीतल होता है।
✦ कपालभाति क्रिया के लाभ
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शारीरिक लाभ
- श्वसन तंत्र, नासिका और कण्ठ शुद्ध होते हैं।
- मस्तिष्क को शुद्ध व सक्रिय बनाता है।
- पाचन क्रिया को सशक्त करता है।
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मानसिक लाभ
- आलस्य, मानसिक तनाव और अवसाद को दूर करता है।
- मन को एकाग्र व स्थिर करता है।
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आध्यात्मिक लाभ
- मस्तिष्क में प्रकाश और चेतना का विकास होता है।
- साधक को ध्यान एवं समाधि के लिए तैयार करता है।
✅ इस प्रकार, घेरंड संहिता के अनुसार कपालभाति के तीन प्रकार (वातक्रमा, व्यात्क्रमा, शीत्क्रमा) बताए गए हैं और यह शरीर, मन व आत्मा को शुद्ध करने वाली श्रेष्ठ क्रिया है|
