BAHL(N)201 IMPORTANT SOLVED QUESTIONS 2025
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प्रश्न 01 : रीतिकालीन कविताओं का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर :
रीतिकाल (आ. 1650 ई. से 1850 ई. तक) हिंदी साहित्य का वह युग है जिसे श्रृंगारिक काव्य का स्वर्णकाल कहा जाता है। इसे मुख्यतः श्रृंगार रस, नायिका-भेद, अलंकार और काव्यशास्त्रीय परंपरा की प्रधानता के कारण पहचाना जाता है।
1. विषय-वस्तु
- रीतिकालीन कविताओं का मूल विषय श्रृंगार रस (श्रृंगार की स्थिति – संयोग और वियोग) रहा।
- नायिका-भेद, नायक-भेद, प्रेम के विविध रूप, श्रृंगार की सूक्ष्म स्थितियाँ और भावनाएँ कवियों का मुख्य आकर्षण रहीं।
- भक्ति-रस भी पाया जाता है, विशेषकर कृष्ण भक्ति की कविताओं में (सूर, देव, घनानंद इत्यादि)।
2. कवि और उनकी प्रवृत्तियाँ
- कवि देव – श्रृंगार और नायिका भेद के श्रेष्ठ चित्रकार।
- घनानंद – वियोग-श्रृंगार के मर्मस्पर्शी कवि।
- कवि बिहारी – संक्षिप्त वाक्य में गहन अनुभूति और अलंकार का प्रयोग।
- कवि केशवदास – रीति-ग्रंथकार और काव्यशास्त्र के आचार्य।
- अन्य कवि – भूषण, पद्माकर, मतिराम, चिंतामणि आदि।
3. काव्य-शिल्प और भाषा
- भाषा प्रायः ब्रजभाषा रही।
- काव्य में अलंकार-प्रधानता और छंद-वैविध्य विशेष उल्लेखनीय है।
- संक्षिप्त किन्तु गहन अभिव्यक्ति में रीतिकालीन कवियों की दक्षता अद्भुत रही।
- रीतिकालीन कविता का उद्देश्य मुख्यतः रसोत्पादन और मनोरंजन रहा।
4. विशेषताएँ
- श्रृंगार रस की प्रधानता – संयोग और वियोग का सुंदर चित्रण।
- नायिका-भेद – स्वाभाविक, सखी-संवाद एवं मनोवैज्ञानिक विवेचन।
- अलंकारों की बहुलता – उपमा, रूपक, अतिशयोक्ति, श्लेष आदि।
- भक्ति का समावेश – विशेषतः राधा-कृष्ण संबंधी काव्य।
- राजाश्रय – दरबारी वातावरण में कवियों का विकास।
5. सीमाएँ
- अधिकांश कविताएँ सामाजिक यथार्थ से दूर हैं।
- आमजन की पीड़ा, राजनीति और समाज की वास्तविक समस्याएँ इन कविताओं में कम दिखाई देती हैं।
- अलंकार और श्रृंगार पर अधिक बल देने से कभी-कभी कृत्रिमता का आभास होता है।
6. महत्व और मूल्यांकन
- रीतिकालीन कविता हिंदी साहित्य में सौंदर्य-बोध, रस-प्रधानता और कलात्मकता का उत्कर्ष है।
- इसने भाषा और काव्य-शिल्प को अत्यंत परिष्कृत किया।
- यद्यपि सामाजिक और यथार्थवादी दृष्टि से इसकी सीमाएँ रही, परंतु रस, अलंकार, भाषा और काव्य-शिल्प की दृष्टि से इसका साहित्यिक महत्व अविस्मरणीय है।
निष्कर्ष
रीतिकालीन कविताएँ श्रृंगार और रसात्मकता के कारण हिंदी साहित्य में एक विशेष स्थान रखती हैं। भले ही इनमें सामाजिक यथार्थ कम दिखाई देता है, लेकिन भाषिक माधुर्य, अलंकारिक सौंदर्य और भावनात्मक संवेदनशीलता के कारण यह युग हिंदी साहित्य के इतिहास में अनोखा और अविस्मरणीय बन गया।
प्रश्न 02 : रीतिबद्ध कविता की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
रीतिबद्ध कविता का अर्थ है – वह कविता जो किसी रीति-ग्रंथ अथवा काव्यशास्त्रीय नियमों के अनुसार रची गई हो। रीतिकाल में इस प्रकार की कविताओं की अधिकता रही। कवियों ने काव्यशास्त्र के नियमों, नायिका-भेद, रस-भेद, अलंकार आदि को आधार बनाकर काव्य-रचना की। इसे प्रायः आचार्यकाव्य भी कहा जाता है।
रीतिबद्ध कविता की प्रमुख विशेषताएँ
-
काव्यशास्त्र पर आधारित रचना
- कवियों ने काव्यशास्त्र (रीति-ग्रंथ) के सिद्धांतों को आधार बनाया।
- नायक-नायिका भेद, रस, अलंकार और छंद का पालन अनिवार्य माना गया।
-
श्रृंगार रस की प्रधानता
- रीतिबद्ध कविताओं का मुख्य विषय श्रृंगार रहा।
- इसमें संयोग-श्रृंगार और वियोग-श्रृंगार दोनों रूपों का वर्णन मिलता है।
-
नायिका-भेद और नायक-भेद का चित्रण
- विभिन्न प्रकार की नायिकाओं (स्वाधीनपतिका, खंडिता, प्रोषितपतिका आदि) का वर्णन।
- नायक के प्रकारों (अनुकूली, अनुकम्पी आदि) का भी निरूपण।
-
अलंकार-प्रधानता
- उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, श्लेष आदि अलंकारों का अत्यधिक प्रयोग।
- अलंकारों के कारण कविता कलात्मक और सौंदर्यपूर्ण बनी।
-
छंद एवं शिल्प की सज्जा
- कविताओं में छंद, लय और ध्वनि की सुन्दरता का विशेष ध्यान।
- दोहा, सोरठा, कवित्त, सवैया आदि छंदों का प्रयोग हुआ।
-
भाषा
- ब्रजभाषा का सर्वाधिक प्रयोग।
- भाषा को परिष्कृत और काव्योपयुक्त बनाया गया।
-
कृत्रिमता का आभास
- कई बार कविताएँ अधिक शास्त्रीय नियमों में बंध जाने के कारण स्वाभाविकता खो बैठीं।
- वास्तविक जीवन और समाज से दूरी दिखाई देती है।
उदाहरण
- केशवदास की रसिकप्रिया, काव्यप्रकाश आदि रचनाएँ।
- देव, पद्माकर और बिहारी की कविताओं में रीतिबद्धता का प्रभाव।
निष्कर्ष
रीतिबद्ध कविता में श्रृंगारिक सौंदर्य, अलंकारिक वैभव और काव्यशास्त्रीय नियमों की परिपूर्णता दिखाई देती है। यद्यपि इन कविताओं में कभी-कभी जीवन के यथार्थ से दूरी और कृत्रिमता का बोध होता है, फिर भी भाषा, शिल्प और रसोत्पादन की दृष्टि से ये हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट धरोहर हैं।
प्रश्न 03 : बिहारी की कविता पर विचार कीजिए।
उत्तर :
बिहारीलाल (1603–1663 ई.) रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवियों में माने जाते हैं। उनकी रचनाएँ विशेषकर ‘बिहारी सतसई’ हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। बिहारी की कविता संक्षिप्तता, गहनता, अलंकारिक सौंदर्य और श्रृंगारिक रसात्मकता के कारण विशिष्ट स्थान रखती है।
1. काव्य-रूप और संरचना
- बिहारी सतसई में लगभग 700 दोहे हैं।
- प्रत्येक दोहा छोटा होने पर भी गहन भाव और व्यापक अर्थ को समेटे रहता है।
- उनकी कविता में सूक्ष्मता और संकेतात्मकता की अनोखी विशेषता है।
2. विषय-वस्तु
- मुख्यतः श्रृंगार रस की प्रधानता।
- संयोग और वियोग, नायक-नायिका के मनोभाव, प्रेम की सूक्ष्म स्थितियों का चित्रण।
- साथ ही भक्ति, नीति और जीवन-दर्शन से जुड़े दोहे भी मिलते हैं।
3. भाषा और शैली
- भाषा मुख्यतः ब्रजभाषा है, जो सहज, मधुर और काव्योपयुक्त है।
- बिहारी की शैली को ‘सूक्ष्म और सारगर्भित’ कहा जाता है।
- संक्षिप्त शब्दों में गहरी बात कहने की अद्भुत क्षमता।
4. अलंकार और काव्य-शिल्प
- उपमा, रूपक, श्लेष और संकेतन अलंकारों का अत्यधिक प्रयोग।
- छंद और लय की दृष्टि से पूर्णता।
- प्रत्येक दोहा भावनात्मक सौंदर्य और कलात्मक माधुर्य से ओतप्रोत।
5. विशेषताएँ
- सूक्ष्मता – कम शब्दों में गहन भाव।
- रस-प्रधानता – विशेषकर श्रृंगार रस का उत्कर्ष।
- नीतिपरकता – कुछ दोहों में नीति और जीवन-मूल्य।
- संकेतात्मकता – प्रत्यक्ष न कहकर संकेत में भाव प्रस्तुत करना।
- लोकप्रियता – बिहारी के दोहे आज भी लोकजीवन और शिक्षा दोनों में प्रचलित हैं।
6. सीमाएँ
- अधिकांश रचनाएँ दरबारी वातावरण और श्रृंगार रस तक सीमित हैं।
- सामाजिक यथार्थ और जनजीवन की समस्याओं का अभाव।
निष्कर्ष
बिहारी की कविता संक्षिप्तता में व्यापकता, गहन भाव, अलंकारिक सौंदर्य और श्रृंगारिक माधुर्य की अद्भुत मिसाल है। उनकी रचनाएँ हिंदी साहित्य में नीति, सौंदर्य और कलात्मकता का आदर्श प्रस्तुत करती हैं। यद्यपि सामाजिक यथार्थ का चित्रण कम है, फिर भी काव्य-शिल्प की दृष्टि से बिहारी को रीतिकाल का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है।
प्रश्न 04 : रीतिसिद्ध कविता की विशेषता बताइए।
उत्तर :
रीतिसिद्ध कविता रीतिकाल की वह धारा है, जिसमें कवि रीति-ग्रंथों (काव्यशास्त्र) के सिद्धांतों के अनुसार काव्य-रचना करते थे। इन कविताओं में काव्यशास्त्रीय नियम, रस, अलंकार और नायिका-भेद का पूरा पालन मिलता है। इसे रीतिकाव्य की आचार्यधारा भी कहा जाता है।
रीतिसिद्ध कविता की प्रमुख विशेषताएँ
-
रीति-ग्रंथ आधारित रचना
- कविताएँ काव्यशास्त्र (रीति-ग्रंथों) के अनुसार लिखी गईं।
- नायक-नायिका भेद, रस, अलंकार, छंद आदि की परंपरा का पालन।
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श्रृंगार रस की प्रधानता
- संयोग और वियोग दोनों रूपों का सुंदर वर्णन।
- प्रेम की मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मताओं का चित्रण।
-
नायिका और नायक भेद का विस्तार
- स्वाधीनपतिका, खंडिता, वासकसज्जा, प्रोषितपतिका आदि नायिकाओं का चित्रण।
- नायकों के भी विभिन्न प्रकार बताए गए।
-
अलंकार-प्रधानता
- उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, श्लेष, अनुप्रास आदि का प्रचुर प्रयोग।
- काव्य को कलात्मक और सौंदर्यपूर्ण बनाने की प्रवृत्ति।
-
काव्य-शिल्प की सज्जा
- छंद, लय और भाषा की मधुरता पर विशेष ध्यान।
- दोहा, सोरठा, कवित्त, सवैया आदि छंदों का प्रयोग।
-
भाषा
- मुख्यतः ब्रजभाषा का प्रयोग।
- भाषा को परिष्कृत, अलंकारिक और रससंपन्न बनाया गया।
-
कृत्रिमता और सीमाएँ
- अत्यधिक शास्त्रीय बंधन के कारण कविता कभी-कभी कृत्रिम और यथार्थ से दूर लगती है।
- सामान्य जनजीवन और सामाजिक समस्याएँ इन कविताओं में नहीं मिलतीं।
उदाहरण
- केशवदास की रसिकप्रिया और काव्यप्रकाश।
- देव और पद्माकर की कविताएँ।
निष्कर्ष
रीतिसिद्ध कविता में काव्यशास्त्र की परंपरा, श्रृंगारिक सौंदर्य और अलंकारिक वैभव की झलक मिलती है। इन कविताओं ने हिंदी साहित्य में कलात्मकता और शास्त्रीयता का उत्कर्ष प्रस्तुत किया, यद्यपि यथार्थवादी और जनजीवन से जुड़े विषय इसमें प्रायः अनुपस्थित रहे।
प्रश्न 05 : रीतिमुक्त साहित्य की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
रीतिकालीन काव्यधारा को सामान्यतः तीन भागों में बाँटा जाता है – रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त। इनमें रीतिमुक्त साहित्य वह धारा है, जो रीतिकालीन शास्त्रीय नियमों और दरबारी परंपराओं से मुक्त होकर मानव जीवन, समाज और यथार्थ भावनाओं को अभिव्यक्ति देती है। इस धारा के कवियों ने रीति-ग्रंथों के बंधनों को स्वीकार नहीं किया और स्वतंत्र भाव से काव्य-रचना की।
रीतिमुक्त साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ
-
स्वतंत्रता की भावना
- कवियों ने काव्य-शास्त्र के कठोर नियमों का पालन नहीं किया।
- कविता को रीति-ग्रंथों की परंपराओं से मुक्त कर स्वतंत्र अभिव्यक्ति दी।
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मानव जीवन का यथार्थ चित्रण
- केवल श्रृंगार नहीं, बल्कि जीवन की विविधता, सुख-दुःख, समाज और प्रकृति का भी चित्रण।
- मानवीय संवेदनाओं को वास्तविक रूप में प्रस्तुत किया गया।
-
श्रृंगार रस से परे विषय-वस्तु
- यद्यपि श्रृंगार रस का प्रभाव है, परंतु साथ ही भक्ति, करुणा, शांति और नीति के भाव भी प्रमुख हैं।
- सामान्य लोकजीवन और ग्रामीण परिवेश को भी महत्व दिया गया।
-
भक्ति-भावना
- कई रीतिमुक्त कवियों ने कृष्णभक्ति और निर्गुण भक्ति की रचनाएँ कीं।
- इन कविताओं में भक्ति की सहजता और आत्मीयता झलकती है।
-
प्रकृति चित्रण
- वर्षा, ऋतु-परिवर्तन, ग्रामीण जीवन, खेत-खलिहान, पशु-पक्षी आदि का यथार्थ चित्रण।
- यह चित्रण कृत्रिम न होकर सजीव और सहज है।
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भाषा की सादगी
- भाषा अपेक्षाकृत सरल और बोलचाल के निकट।
- ब्रजभाषा के साथ-साथ अवधी और अन्य बोलियों का प्रयोग भी मिलता है।
-
कृत्रिमता का अभाव
- रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध काव्य की तरह अत्यधिक अलंकार-योजना या नायिका-भेद का बंधन नहीं।
- कविता अधिक प्राकृतिक और सहज प्रतीत होती है।
प्रमुख कवि और रचनाएँ
- गिरधर कविराय – भक्ति और नीति प्रधान कविताएँ।
- घनानंद – वियोग और करुणा से ओतप्रोत श्रृंगारिक काव्य।
- ठाकुर – प्रकृति और लोकजीवन का चित्रण।
निष्कर्ष
रीतिमुक्त साहित्य ने हिंदी साहित्य को सजीवता, मानवीयता और स्वतंत्रता प्रदान की। यह साहित्य रीतिकाल की कृत्रिम और शास्त्रीय प्रवृत्तियों से हटकर यथार्थ, भक्ति और लोकजीवन की ओर अग्रसर हुआ। इसीलिए इसे रीतिकाल का सबसे स्वतंत्र और मौलिक योगदान माना जाता है।
प्रश्न 06 : प्रमुख रीतिमुक्त कवि और उनकी रचनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
रीतिकाल के अंतर्गत आने वाला रीतिमुक्त काव्य उन कवियों की रचनाओं को कहा जाता है, जिन्होंने रीति-ग्रंथों के बंधनों और अलंकारप्रधान शास्त्रीयता को स्वीकार नहीं किया। इन कवियों ने अपनी कविताओं में मानवीय भावनाओं, करुणा, भक्ति और प्रकृति को अधिक महत्व दिया। इस धारा के कवियों ने हिंदी साहित्य को गहराई और मौलिकता प्रदान की।
प्रमुख रीतिमुक्त कवि और उनकी रचनाएँ
1. गिरधर कविराय
- विशेषता : नीति, भक्ति और मानवीय मूल्यों पर आधारित कविता।
- भाषा : सरल ब्रजभाषा।
- रचनाएँ : गिरधर काव्यावली, भक्तिग्रंथावली, नीतिग्रंथावली।
2. घनानंद
- विशेषता : प्रेम और वियोग के महान कवि।
- इनकी कविताओं में नायिका की विरह वेदना और करुणा का अद्भुत चित्रण है।
- घनानंद को "रीतिकाल का मीरा" कहा जाता है।
- रचनाएँ : घनानंद सवैया संग्रह, घनानंद पदावली।
3. ठाकुर
- विशेषता : लोकजीवन और प्रकृति का अत्यंत सजीव चित्रण।
- ग्रामीण जीवन, खेत-खलिहान, पशु-पक्षी, ऋतुएँ आदि इनकी कविता के प्रिय विषय हैं।
- रचनाएँ : ठाकुर की बानी।
4. अलखदेव
- विशेषता : नीति और भक्ति से युक्त सरल कविता।
- इनकी कविताओं में लोक-जीवन की सहजता और नैतिक शिक्षाएँ झलकती हैं।
- रचनाएँ : अलखदेव काव्यावली।
5. अन्य कवि
- कविंद्र, चिंतामणि, हरिराम व्यास आदि कवियों ने भी रीतिमुक्त काव्य धारा को समृद्ध किया।
निष्कर्ष
रीतिमुक्त कवियों ने हिंदी साहित्य को स्वतंत्रता, सजीवता और मानवीय संवेदनाओं की गहराई दी। जहाँ रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध कवि दरबारी परंपरा और शास्त्रीयता तक सीमित थे, वहीं रीतिमुक्त कवियों ने कविता को यथार्थ, प्रेम, भक्ति और लोकजीवन से जोड़कर उसे अधिक मानवीय और संवेदनशील बना दिया।
प्रश्न 07 : नीति कविता और भक्ति कविता का परिचय दीजिए।
उत्तर :
रीतिकालीन साहित्य को मुख्यतः तीन धाराओं में बाँटा गया है – रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त।
रीतिमुक्त धारा के अंतर्गत ही नीति कविता और भक्ति कविता का विशेष स्थान है। इन दोनों धाराओं ने हिंदी काव्य को एक नई दिशा दी।
1. नीति कविता का परिचय
- अर्थ : नीति कविता वह है, जिसमें कवि ने नीति, नैतिकता, सदाचार, आदर्श जीवन और आचार-विचार का उपदेश दिया हो।
- विशेषताएँ :
- मानव जीवन को आदर्श दिशा देने की प्रेरणा।
- नीति, धर्म, सदाचार, परोपकार और आचरण पर बल।
- भाषा सामान्यतः सरल और शिक्षाप्रद।
- इसमें जीवन-व्यवहार और लोक-जीवन से जुड़े उपदेश मिलते हैं।
- प्रमुख कवि :
- गिरधर कविराय – नीतिग्रंथावली।
- अलखदेव।
- कविंद्र आदि।
👉 उदाहरण :
गिरधर कविराय की पंक्तियाँ —
"जहाँ न मित्र, वहाँ न रहो, जहाँ न लाभ, वहाँ न जाओ।"
इसमें जीवन की व्यवहारिक शिक्षा दी गई है।
2. भक्ति कविता का परिचय
- अर्थ : भक्ति कविता वह है, जिसमें कवि ने ईश्वर के प्रति प्रेम, समर्पण और भक्ति-भावना व्यक्त की हो।
- विशेषताएँ :
- ईश्वर के प्रति प्रेम, समर्पण और साधना।
- भक्ति में सगुण (राम, कृष्ण आदि) और निर्गुण (परम तत्व) दोनों रूपों का चित्रण।
- इसमें दार्शनिक गहराई और आत्मीयता दिखाई देती है।
- भाषा भावपूर्ण, सहज और भक्तिरस से ओतप्रोत।
- प्रमुख कवि :
- घनानंद (प्रेम को भक्ति का रूप मानते हैं)।
- हरिराम व्यास, गिरधर कविराय, अलखदेव आदि।
👉 उदाहरण :
हरिराम व्यास ने लिखा —
"राम नाम बिनु सुख नाहीं।"
अर्थात सच्चा सुख केवल भगवान राम के नाम-स्मरण में है।
निष्कर्ष
रीतिकाल की नीति कविता ने मनुष्य को सदाचार और आदर्श जीवन का मार्ग दिखाया, जबकि भक्ति कविता ने मनुष्य के हृदय को आस्था, प्रेम और ईश्वर-भक्ति से ओतप्रोत किया। दोनों ने मिलकर हिंदी साहित्य को जीवन-दर्शन और आत्मिक शक्ति प्रदान की।
प्रश्न 08 : हिंदी रीतिकालीन कविता का परिचय देते हुए हिंदी आलोचना की प्रवृत्ति पर निबंध लिखिए।
प्रस्तावना
हिंदी साहित्य का रीतिकाल (1600 ई. – 1850 ई.) कवि-प्रतिभा और शास्त्रीय परंपरा का अद्भुत संगम है। यह काल जहाँ एक ओर श्रृंगार रस की प्रधानता के लिए प्रसिद्ध है, वहीं दूसरी ओर इसने अलंकार, रस और काव्यशास्त्र के विविध नियमों को साहित्य में स्थापित किया। रीतिकालीन काव्य की विशेषता है कि इसमें भक्ति, नीति और श्रृंगार तीनों की छटा विद्यमान है। इसी काल में हिंदी आलोचना की प्रवृत्ति भी विकसित हुई और कवियों ने काव्यशास्त्र संबंधी मान्यताओं को सामने रखा।
रीतिकालीन कविता का परिचय
रीतिकालीन कविता को समझने के लिए इसे सामान्यतः तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है –
1. रीतिबद्ध कविता
- इसमें काव्य-रीति और शास्त्रीय सिद्धांतों का पालन किया गया।
- श्रृंगार रस और अलंकारों की प्रधानता।
- प्रमुख कवि : केशव, मतिराम, देव, चिंतामणि त्रिपाठी।
2. रीतिसिद्ध कविता
- इसमें श्रृंगार रस का अत्यधिक आग्रह है।
- नायक-नायिका भेद, श्रृंगारिक चेष्टाओं और अलंकारिक सौंदर्य का विस्तृत चित्रण।
- प्रमुख कवि : बिहारी (बिहारी सतसई)।
3. रीतिमुक्त कविता
- इस धारा के कवि दरबारी परंपरा से मुक्त रहे।
- भक्ति, नीति, करुणा और लोकजीवन के चित्रण पर बल।
- प्रमुख कवि : गिरधर कविराय, घनानंद, ठाकुर, अलखदेव।
हिंदी आलोचना की प्रवृत्ति
रीतिकाल में केवल काव्य-रचना ही नहीं हुई, बल्कि हिंदी आलोचना की परंपरा भी विकसित हुई। इस काल के कवियों ने काव्य के सिद्धांत, रस, अलंकार और काव्य-गुण-दोष पर विचार प्रस्तुत किए।
आलोचना की प्रमुख प्रवृत्तियाँ :
- शास्त्रीय आलोचना
- संस्कृत काव्यशास्त्र से प्रभावित।
- कवियों ने रस, अलंकार, रीति और ध्वनि पर अपने विचार व्यक्त किए।
- केशवदास की कविप्रिया और रसिकप्रिया इसका उदाहरण हैं।
- रस सिद्धांत पर बल
- आलोचकों ने कहा कि कविता का मूल रसास्वादन है।
- श्रृंगार रस को सर्वश्रेष्ठ माना गया।
- अलंकार-प्रधान आलोचना
- कवियों ने विभिन्न अलंकारों के प्रयोग और सौंदर्य पर विचार किया।
- देव की कृतियों में अलंकारों की विस्तृत व्याख्या है।
- नायक-नायिका भेद
- रीतिकालीन आलोचना में नायक-नायिका भेद का विशेष महत्व है।
- रसिकप्रिया और सतसई जैसी कृतियों में नायिका के प्रकार और उनकी चेष्टाओं का विवेचन है।
- नीति और भक्ति की आलोचना
- गिरधर कविराय और अलखदेव जैसे कवियों ने नीति और भक्ति पर आधारित आलोचना प्रस्तुत की।
- यहाँ आलोचना का उद्देश्य केवल श्रृंगार नहीं, बल्कि जीवन-शिक्षा भी था।
निष्कर्ष
रीतिकालीन कविता ने हिंदी साहित्य को रस, अलंकार और शास्त्रीय सौंदर्य प्रदान किया। इस काल की आलोचना प्रवृत्ति ने कविता को सैद्धांतिक आधार दिया और हिंदी आलोचना के भविष्य को मजबूत किया। यद्यपि इसमें श्रृंगार रस की अधिकता रही, फिर भी भक्ति और नीति को भी स्थान मिला। इस प्रकार रीतिकाल न केवल काव्य-रचना का युग है, बल्कि हिंदी आलोचना के विकास का भी महत्वपूर्ण काल है।
प्रश्न 09 : रीतिकालीन काव्य के अंतर्गत प्रमुख उर्दू कवियों का परिचय दीजिए।
प्रस्तावना
रीतिकाल (1600 ई.–1850 ई.) हिंदी साहित्य का वह युग है जिसमें श्रृंगार रस, अलंकार शास्त्र और दरबारी संस्कृति की प्रधानता रही। इस काल में हिंदी के साथ-साथ उर्दू साहित्य का भी विकास हुआ। दरबारों और नवाबों की छत्रछाया में उर्दू कविता को आश्रय मिला। जहाँ हिंदी में बिहारी, केशव, देव जैसे कवि प्रसिद्ध हुए, वहीं उर्दू में भी कई प्रमुख शायरों ने अपने कलाम से साहित्य को समृद्ध किया।
रीतिकालीन उर्दू कवि और उनका परिचय
1. मीर तकी मीर (1723 – 1810)
- उर्दू ग़ज़ल के "खुदा-ए-सुख़न" कहलाते हैं।
- इनकी ग़ज़लों में श्रृंगार, दर्द और करुणा का अद्भुत संगम है।
- मुख्य विशेषता : सरल भाषा, प्रेम और जीवन की गहन अनुभूति।
- कृतियाँ : दीवान-ए-मीर।
2. सौदा (मिर्ज़ा रफ़ी सौदा) (1713 – 1781)
- हास्य और व्यंग्य के महान उर्दू कवि।
- इनकी कविताओं में रीतिकालीन दरबारी जीवन की विडंबनाएँ परिलक्षित होती हैं।
- इन्होंने ग़ज़ल, मस्नवी और क़सीदे की रचना की।
- कृतियाँ : दीवान-ए-सौदा।
3. सिराज-उद-दीन अर्श
- प्रेम और श्रृंगार विषयक काव्य के लिए प्रसिद्ध।
- इन्होंने रीतिकालीन श्रृंगार परंपरा को अपनी ग़ज़लों में अपनाया।
- भावुक और मधुर शैली इनकी विशेषता है।
4. मीर दरद (1721 – 1785)
- सूफ़ी विचारधारा से प्रभावित।
- इनके काव्य में आध्यात्मिक प्रेम, ईश्वर-भक्ति और सूफ़ी भावनाएँ प्रकट होती हैं।
- इनकी कविता में रीतिकालीन भक्ति और सूफ़ी चिंतन का संगम है।
5. ख़्वाजा मीर दर्द और मोहम्मद रफ़ी सौदा के समकालीन अन्य शायर
- दरबारी जीवन से प्रेरित।
- ग़ज़ल और मस्नवी के माध्यम से प्रेम, श्रृंगार और नैतिक शिक्षाओं का प्रचार।
रीतिकालीन उर्दू कविता की विशेषताएँ
- श्रृंगार और प्रेम भाव की प्रधानता।
- ग़ज़ल और मस्नवी जैसी काव्य-शैलियों का विकास।
- दरबारी संस्कृति और तत्कालीन जीवन का चित्रण।
- सूफ़ी दर्शन और आध्यात्मिक विचारों का प्रभाव।
- भाषा में संगीतात्मकता और भावनात्मक गहराई।
निष्कर्ष
रीतिकालीन हिंदी कविता जहाँ अलंकार और श्रृंगार रस पर आधारित थी, वहीं उर्दू कविता ने भी इस काल में उल्लेखनीय प्रगति की। मीर तकी मीर, सौदा, मीर दरद जैसे शायरों ने ग़ज़ल और मस्नवी के माध्यम से प्रेम, भक्ति और जीवन-दर्शन को स्वर दिया। इस प्रकार रीतिकाल न केवल हिंदी बल्कि उर्दू साहित्य के लिए भी स्वर्णिम युग सिद्ध हुआ।
प्रश्न 10 : ब्रजभाषा गद्य और खड़ी बोली गद्य पर टिप्पणी लिखिए
प्रस्तावना
हिंदी साहित्य में गद्य का विकास धीरे-धीरे हुआ। प्रारंभिक गद्य लेखन ब्रजभाषा में हुआ, क्योंकि उस समय यह साहित्य की मुख्य भाषा थी। आगे चलकर उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली गद्य का विकास हुआ और यह आधुनिक हिंदी की संवाहक भाषा बन गई। दोनों रूपों का महत्व अपनी-अपनी ऐतिहासिक और साहित्यिक दृष्टि से है।
1. ब्रजभाषा गद्य
विशेषताएँ :
- ब्रजभाषा मूलतः काव्य की भाषा थी, परंतु गद्य-लेखन में भी इसका प्रयोग हुआ।
- इसमें संस्कृतनिष्ठ शब्दावली और भावुकता की प्रधानता रही।
- शैली में लालित्य, कोमलता और संगीतात्मकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
- प्रारंभिक गद्य ग्रंथ धार्मिक, दार्शनिक और कथा-प्रधान थे।
प्रमुख लेखक और कृतियाँ :
- लल्लूलाल की प्रेमसागर (1805 ई.) – ब्रजभाषा गद्य की प्रतिनिधि रचना।
- अन्य धार्मिक और ऐतिहासिक गद्य भी ब्रजभाषा में लिखे गए।
2. खड़ी बोली गद्य
विशेषताएँ :
- खड़ी बोली गद्य का उद्भव उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ।
- इसमें सरलता, स्पष्टता और व्यवहारिकता की प्रधानता है।
- आधुनिक गद्य-विधाएँ – निबंध, उपन्यास, कहानी, नाटक, पत्रकारिता – का विकास खड़ी बोली में हुआ।
- इसने हिंदी साहित्य को सर्वमान्य रूप प्रदान किया।
प्रमुख लेखक और कृतियाँ :
- भारतेंदु हरिश्चंद्र : भारत दुर्दशा, वैदेशिक यात्रा।
- बालकृष्ण भट्ट : हिंदी प्रदीप पत्र।
- महावीर प्रसाद द्विवेदी : गद्य की सशक्त परंपरा को आगे बढ़ाने वाले।
तुलनात्मक टिप्पणी
| पक्ष | ब्रजभाषा गद्य | खड़ी बोली गद्य |
|---|---|---|
| काल | 18वीं–19वीं शताब्दी का आरंभ | 19वीं शताब्दी का उत्तरार्ध |
| स्वरूप | काव्यात्मक और भावुक | सरल, स्पष्ट और व्यावहारिक |
| शब्दावली | संस्कृत और तद्भव शब्द | सामान्य बोलचाल और तत्सम शब्द |
| प्रमुख कृति | प्रेमसागर | भारत दुर्दशा, हिंदी प्रदीप |
| योगदान | हिंदी गद्य का प्रारंभिक रूप | आधुनिक हिंदी गद्य की नींव |
निष्कर्ष
ब्रजभाषा गद्य ने हिंदी गद्य परंपरा को प्रारंभिक दिशा दी, जबकि खड़ी बोली गद्य ने उसे आधुनिक रूप और व्यापकता प्रदान की। आज की मानक हिंदी खड़ी बोली पर आधारित है, परंतु ब्रजभाषा गद्य का योगदान आधार-शिला के रूप में सदा स्मरणीय रहेगा।
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